वज़न घटाना केवल कैलोरीयों की गणना करने जैसे सरल समीकरण से कहीं अधिक जटिल है। दशकों से लोगों को बताया गया है कि उनका वज़न केवल ‘कैलोरी इन, कैलोरी आउट’ के सिद्धांत पर निर्भर करता है। यदि ऐसा होता, तो अधिक संख्या में लोग अपनी इच्छित वज़न पर होते। पर वास्तविकता इससे कहीं अधिक पेचीदा है।
वज़न घटाने में चैंलेंज क्यों है, इसके कई सिद्धांत हैं। कुछ जेनेटिक्स और मेटाबोलिज्म पर जोर देते हैं, जबकि अन्य पर्यावरणीय और सामाजिक कारकों को अधिक महत्त्व देते हैं। लेकिन इनमें से कौन सा सिद्धांत सही है? क्या हमारे वज़न का नियंत्रण हमारे आनुवंशिकी, मेटाबोलिज्म या पर्यावरण निर्धारण ही करते हैं?
मैं एक डायबिटोलॉजिस्ट और मोटापे की चिकित्सा विशेषज्ञ हूं। इन सिद्धांतों के ज्ञान से संभावित रूप से हमारी जैविक सीमाओं को पहचान कर वज़न में बदलाव लाया जा सकता है।
सेट पॉइंट वज़न
1950 के दशक से सेट पॉइंट वज़न की अवधारणा प्रचलित है। यह बताती है कि शरीर में एक नियंत्रण तंत्र होता है जो एक पूर्व निर्धारित वसा स्तर की रक्षा करता है — जिसे सामान्यतः वसा कहा जाता है। यह तंत्र भूख और ऊर्जा व्यय को बदल कर शरीर में वसा की इस निर्धारित मात्रा को बनाए रखता है। यह स्तर अनुवांशिकी, शरीर विज्ञान और पर्यावरणीय कारकों से संचालित होता है।
इस सिद्धांत को यह अवलोकन सहारा देता है कि जब वजन कम होता है तो भूख बढ़ जाती है और ऊर्जा व्यय घट जाता है जब तक की वजन पुनः सामान्य स्तर पर ना आ जाए। यह प्रक्रिया शरीर को गंभीर वजन कमी के दौरान भूखमरी से बचाने के लिए होती है। एक अध्ययन में पाया गया कि वजन घटाने पर हार्मोन बदल जाते हैं जो भूख और ऊर्जा व्यय को प्रभावित करते हैं।
वास्तव में, यह तंत्र शरीर को वज़न कम करने के प्रयासों के खिलाफ एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया विकसित करता है, जिससे दिर्घकालिक वजन घटाने में कठिनाई आती है। इसलिए केवल कैलोरी नियंत्रण से अधिक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है जो जैविक, पर्यावरणीय और व्यवहारिक पहलुओं को समझे।
वज़न घटाना एक बहुआयामी प्रक्रिया है जिसमें आनुवंशिकी, मेटाबोलिज्म, पर्यावरण और जीवनशैली के जटिल अंतःक्रियाएं शामिल हैं। समझदारी और पेशेवर सलाह के साथ, कोई इस प्रक्रिया को समझ कर बेहतर परिणाम हासिल कर सकता है।