मोदी युग के बाद: भारत के नए शासन तंत्र की वास्तविकता
2017 में स्वतंत्रता दिवस और नववर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “नई भारत” के आगमन की घोषणा की। 2019 में पुनः निर्वाचित होने के बाद इस नये भारत के निर्माण की प्रक्रिया ने नई गति पकड़ी। तब से भारतीय राजनीति की नजर रखने वाले हर व्यक्ति के लिए स्पष्ट हो गया है कि एक आदतन संरचना में बदलाव जारी है, और पुराना क्रम लगभग समाप्ति की ओर है।
जवाहरलाल नेहरू, कांग्रेस पार्टी एवं अन्य विरुद्ध अभियान के नाम पर जो कार्रवाई हो रही है, वह वस्तुतः 1950 में स्थापित संवैधानिक गणराज्य पर सीधा प्रहार है। “नई भारत”, “विकसित भारत” तथा “हिंदू राष्ट्रवाद” के विचारों के जरिए एक नया शासन तंत्र स्थापित किया जा रहा है, जो अब धीरे-धीरे स्थिर हो रहा है।
कई लोग मानते हैं कि यह नया शासन अभी पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हुआ है। वे मौजूदा सत्ता संरचनाओं की कमजोरियों को लेकर यह तर्क देते हैं कि न तो नया शासन पूरी तरह स्थापित हुआ है और न ही कोई नया प्रभुत्व सिद्ध हुआ है। किन्तु, यह समझना जरूरी है कि इस शासन की दमनकारी प्रवृत्ति, हिंसा के प्रति झुकाव, जल्दबाजी और चिड़चिड़ापन अस्थिरता के संकेत नहीं बल्कि इसकी मूल विशेषता हैं।
यह शासन उत्साही शक्तिप्रदर्शन, आवेगपूर्ण निर्णयों और कठोर नियंत्रण के साथ परिभाषित है। बदलाव की मांगों के बावजूद इसकी गढ़ी गई संरचना देश के संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक संस्थानों और सामाजिक समरसता के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करती है।
अतः भारतीय राजनीति और समाज में जो परिवर्तन नजर आ रहे हैं, उनके गहरे प्रभाव और अंतर्निहित संरचना को समझना अनिवार्य है, जिससे एक संतुलित और तथ्यपूर्ण विश्लेषण हो सके।