स्कूल मेन्यू से अंडों को हटाने पर हालिया विवाद: बच्चों के पोषण और राजनीतिक एजेंडे का टकराव
पश्चिम बंगाल में स्कूलों के मध्याह्न भोजन से अंडे को हटाने की हालिया योजना ने बच्चों के स्वास्थ्य और राजनीतिक विचारधारा के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। इस कदम को राज्य की नई भाजपा शासित सरकार की हिंदुत्व नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो गरीब परिवारों के बच्चों के पोषण को नजरअंदाज करता दिखता है।
इस गतिरोध की शुरुआत जून में हुई जब पश्चिम बंगाल की नई सरकार ने स्कूलों के भोजन निर्माण का कार्य इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) को सौंपने की घोषणा की। इस धार्मिक संगठन ने अंडों को हटाकर सोयाबीन, राजमा और पनीर जैसे विकल्प स्वीकार किए। हिंदुत्व समर्थक इन विकल्पों को पर्याप्त पोषण स्रोत मानते हैं, जबकि विपक्ष इस नीति की आलोचना करता है। उनके अनुसार, यह हिंदुत्व समर्थकों द्वारा पोषणीय जरूरतों और सांस्कृतिक वास्तविकताओं की उपेक्षा करते हुए आहार को राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण से पुनःपरिभाषित करने का प्रयास है।
दरअसल, अन्य राज्यों ने पश्चिम बंगाल की तुलना में पहले भी अंडों को स्कूल के मध्याह्न भोजन कार्यक्रम से हटाया था। उदाहरण के तौर पर, 2015 में मध्य प्रदेश में बीजेपी सरकार ने अंडों को स्कूल भोजन से बाहर रखा था, जबकि 2025 में महाराष्ट्र ने स्कूलों में अंडे और बाजरे से बने मिठाई के लिए सरकारी वित्त पोषण वापस ले लिया।
2014 में केंद्र में बीजेपी की सत्ता में आने के बाद से खाद्य संबंधी विवाद सिर्फ आहार या स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहे। गोमांस पर प्रतिबंधों ने मुस्लिम, दलित और गोवंश व्यापार तथा चमड़ा उद्योग पर निर्भर समुदायों की आजीविका को बुरी तरह प्रभावित किया है। गाय संरक्षण के नाम पर हुई सतर्कता हिंसा ने सामाजिक तनाव को और बढ़ाया है।
इस पूरे परिप्रेक्ष्य में, पश्चिम बंगाल की नई नीति पर सवाल उठते हैं कि क्या बच्चों के पोषण अधिकारों को राजनीतिक एवं धार्मिक एजेंडों से ऊपर रखा जाएगा या नहीं। यह स्थिति भारत की बहुसांस्कृतिक और बहुभाषी सामाजिक संरचना में खाद्य विविधता पर बढ़ते दबाव को भी दर्शाती है, जहाँ आहार नीति केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक विचारों का भी दर्पण बन जाती है।