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सतलुज समीक्षा: निर्दयता और साहस की दिल दहला देने वाली कहानी

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Jul 4, 2026 #source
‘Satluj’ review: A harrowing, heart-rending tale of impunity and courage

निर्दयता और साहस की मार्मिक कहानी: सतलुज समीक्षा

हाल ही में स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म जी5 पर रिलीज हुई फिल्म सतलुज ने पंजाब की एक संवेदनशील और गंभीर सामाजिक समस्या को प्रमुखता से उजागर किया है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा की गुमशुदगी पर आधारित है, जो 1995 के दशक की पृष्ठभूमि में उत्पन्न हुई है।

फिल्म की कहानी 1990 के दशक के पंजाब के आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान हुई कथित पुलिस अत्याचारों और जबरन गुमशुदगियों की जांच के इर्द-गिर्द घूमती है। जसवंत सिंह खालरा ने इन काले अध्यायों को सामने लाने का साहसिक प्रयास किया था। हालांकि, उनका अपहरण कर दिया गया और उनकी हत्या कर दी गई, जिसके लिए कुछ निचले पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। लेकिन उनका शरीर आज तक नहीं मिला।

फिल्म की शुरुआत एक स्याह और भयावह रात में हो रही कार्रवाई से होती है, जो पुलिस द्वारा चुपके से अनदेखी हरकतों का प्रतीक है। ऐसे दृश्य, जहां पुलिस वाहन निर्जन और अंधेरे खेतों से गुजरते हैं, दर्शकों को उस भयावहता और निर्दयता का एहसास कराते हैं, जो हिंसा के समय छिपी होती है।

मुख्य पात्र जसवंत की भूमिका दिलजीत दोसांझ ने निभाई है, जो अपने मित्र की गुमशुदगी और उसकी माँ के विरोध को देखकर इस रहस्य की तह तक पहुँचने का प्रयास करता है। इस दौरान वह उन कई अनजान शवों की संख्या में रहस्यमय वृद्धि पर सवाल उठाता है, जो मोहल्लों में जमा होते जा रहे हैं। यह फिल्म मानवाधिकारों के हनन और राज्य की गैरजवाबदेही पर एक आंख खोलने वाली रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत होती है।

“सतलुज” को सेंसर बोर्ड के कई कटौती मांगने के बावजूद बिना किसी बदलाव के रिलीज़ किया गया है, जो स्वतंत्र अभिव्यक्ति की एक महत्वपूर्ण जीत है। फिल्म की हिंदी-पंजाबी मिश्रित भाषा और वास्तविक घटनाओं पर आधारित कथानक इसे और भी प्रभावशाली बनाता है।

इस फिल्म के माध्यम से निर्माता हनी त्रेहन ने एक सशक्त और संवेदनशील सामाजिक दस्तावेज प्रस्तुत किया है, जो न केवल दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है, बल्कि इतिहास के इस काले अध्याय को उजागर कर मानवाधिकारों की लड़ाई को भी सम्मानित करता है।

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Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)