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‘वाइब’ मूवी रिव्यू: कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की जोड़ी ने जमाया रंग, प्रीति जिंटा का अंदाज भी खास

कुणाल खेमू ने एक बार फिर बतौर लेखक-निर्देशक गंभीर विषय के बजाय कॉमेडी और मनोरंजन को अपनी फिल्म का आधार बनाया है। ‘मडगांव एक्सप्रेस’ के बाद उनकी नई फिल्म ‘वाइब’ भी दर्शकों को हंसाने और हल्के-फुल्के अंदाज में एंटरटेन करने की कोशिश करती है। अच्छी बात यह है कि फिल्म अपने इस मकसद में काफी हद तक सफल होती है और खासतौर पर कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की जोड़ी कई मौकों पर खूब हंसाती है।

क्या है ‘वाइब’ की कहानी?

फिल्म की कहानी हार्दिक (कुणाल खेमू) और बग्स (स्पर्श श्रीवास्तव) नाम के दो बेहद करीबी दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों की जिंदगी एक-दूसरे से काफी अलग है। बग्स एक बड़ी AI सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी करता है, जबकि हार्दिक हाल ही में रिहैब से बाहर निकला है। ड्रग्स की लत ने हार्दिक की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया था और उसे इस स्थिति से बाहर निकालने में बग्स ने अहम भूमिका निभाई है। इतना ही नहीं, वह अपने दोस्त को अपनी कंपनी में काम भी दिला देता है।

हार्दिक की जिंदगी में बदलाव की एक और वजह तब सामने आती है, जब उसकी मुलाकात कंपनी में इंटर्न के तौर पर आई करीना से होती है। करीना के आने के बाद हार्दिक को अपनी जिंदगी दोबारा बेहतर तरीके से शुरू करने की उम्मीद दिखाई देने लगती है। लेकिन कहानी जल्द ही बिल्कुल अलग दिशा पकड़ लेती है।

जिस कंपनी में दोनों दोस्त सामान्य जिंदगी जी रहे होते हैं, वही उन्हें एक ऐसे मामले में खींच लेती है जिसका संबंध देश की सुरक्षा से है। देखते ही देखते हार्दिक और बग्स एक हाई-स्टेक मिशन का हिस्सा बन जाते हैं।

इस मिशन की जिम्मेदारी मैडम एच (प्रीति जिंटा) के पास है। वह दोनों को पूरे मामले की गंभीरता समझाती हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि दोनों में से किसी को भी जासूसी मिशन का अनुभव नहीं है। मैडम एच अपने एजेंट्स रावल (यशपाल शर्मा) और बंसी (दिनेश लाल यादव) की मदद से उन्हें तैयार करने की कोशिश करती हैं।

हालात हालांकि इतने तेजी से बदलते हैं कि दोनों को ट्रेनिंग पूरी होने का इंतजार नहीं मिलता। देश की सुरक्षा को खतरा देखते हुए हार्दिक और बग्स को समय से पहले ही मिशन पर उतरना पड़ता है। अब ये दोनों अनुभवहीन दोस्त अपनी सूझबूझ और हिम्मत के सहारे देश को बचा पाते हैं या खुद किसी बड़ी परेशानी में फंस जाते हैं, फिल्म इसी सफर को दिखाती है।

कॉमेडी के साथ स्पाई थ्रिलर का तड़का

स्पाई थ्रिलर फिल्मों में आमतौर पर गंभीर माहौल, खतरनाक मिशन और तनाव से भरी कहानी देखने को मिलती है। ‘वाइब’ इस फॉर्मूले को कॉमेडी के साथ मिलाकर पेश करती है। कहानी का बेस भले ही दर्शकों को कुछ जाना-पहचाना लगे, लेकिन इसका स्क्रीनप्ले फिल्म को अलग बनाए रखने में मदद करता है।

कुणाल खेमू ने कहानी में लगातार कॉमिक सिचुएशंस और मजेदार पंच शामिल किए हैं। फिल्म शुरू होते ही उसका मूड और टोन स्पष्ट हो जाता है। ओपनिंग क्रेडिट्स से ही यह संकेत मिलने लगता है कि फिल्म खुद को बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लेने वाली है।

एक दिलचस्प वॉइस ओवर भी शुरुआत से कहानी को आगे बढ़ाने का काम करता है। लेखक के तौर पर कुणाल के कई अतरंगे और मजेदार आइडिया अलग-अलग मौकों पर सामने आते हैं। पहले हिस्से में हार्दिक और बग्स की दोस्ती, उनकी नोक-झोंक और आपसी तालमेल के जरिए कॉमेडी का अच्छा माहौल बनता है। स्क्रीनप्ले भी लगातार नए कॉमिक मोमेंट्स और सरप्राइज पेश करता रहता है।

हालांकि इंटरवल के बाद फिल्म का मिजाज बदलता है। कहानी नैशनल सिक्योरिटी से जुड़े मुख्य मुद्दे पर ज्यादा ध्यान देने लगती है और एक्शन का हिस्सा बढ़ जाता है। इसी वजह से सेकंड हाफ में कॉमेडी पहले के मुकाबले कम महसूस होती है।

टेररिस्ट एंगल आने के बाद कुछ समय के लिए कहानी अपने शुरुआती ट्रैक से हटती हुई लगती है। लेकिन क्लाइमैक्स में फिल्म फिर अपने मूल कॉमिक अंदाज की तरफ लौटती है।

म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर

अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म के मॉडर्न और थोड़े अतरंगे अंदाज के साथ अच्छी तरह मेल खाता है। वहीं जॉन स्टीवर्ट एडुरी का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की गति बनाए रखता है। एक्शन वाले हिस्सों में यह उत्साह बढ़ाता है, जबकि कॉमेडी सीन में कहानी के हल्के-फुल्के मूड को और मजबूत करता है।

कैसी है कलाकारों की एक्टिंग?

कुणाल खेमू एक बार फिर अपने कॉमिक अंदाज से प्रभावित करते हैं। ‘गो गोवा गोन’, ‘कंजूस मक्खीचूस’ और ‘लूटकेस’ जैसी फिल्मों में उनकी कॉमेडी टाइमिंग पहले ही दर्शकों को देखने को मिल चुकी है। इस फिल्म में भी उन्होंने हार्दिक के किरदार को उसी सहजता से निभाया है।

खास बात यह है कि कुणाल ने यहां पारंपरिक बॉलीवुड हीरो जैसा किरदार निभाने के बजाय एक ऐसे शख्स को चुना है जो डरपोक भी है और कई बार बेवकूफियां भी करता है। वह अपने किरदार को किसी ग्लैमरस हीरो की तरह पेश करने की कोशिश नहीं करते और यही बात उनके अभिनय को मजेदार बनाती है।

स्पर्श श्रीवास्तव भी अपने सहज अभिनय से फिल्म में जान डालते हैं। कुणाल और स्पर्श की जोड़ी फिल्म की सबसे मजबूत चीजों में से एक है। दोनों के बीच होने वाली नोक-झोंक, दोस्ती और स्क्रीन पर उनकी केमिस्ट्री कई दृश्यों को मनोरंजक बना देती है।

प्रीति जिंटा मैडम एच के किरदार में अलग ही अंदाज में नजर आती हैं। उनके किरदार में रौब और आत्मविश्वास दोनों देखने को मिलता है। ‘बटवारा 1947’ के बाद प्रीति को इस तरह के अलग रूप में देखना दिलचस्प अनुभव है।

‘वाइब’ के साथ वंशिका धीर ने एक्टिंग की शुरुआत की है। वह स्क्रीन पर खूबसूरत लगती हैं और अपने किरदार में सहज दिखाई देती हैं। यशपाल शर्मा और दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ भी अपने-अपने रोल में प्रभाव छोड़ते हैं और किरदारों के साथ न्याय करते हैं।

फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट भी ठीक काम करती है। कलाकारों का प्रदर्शन कहानी के कॉमिक टोन को बरकरार रखने में मदद करता है।

क्यों देखें ‘वाइब’?

अगर आपको हल्की-फुल्की कॉमेडी पसंद है और स्पाई थ्रिलर को एक मजेदार अंदाज में देखना चाहते हैं, तो ‘वाइब’ आपके लिए एक विकल्प हो सकती है। खासतौर पर कुणाल खेमू और स्पर्श श्रीवास्तव की दोस्ती, उनकी कॉमिक टाइमिंग और स्क्रीन पर दिखाई देने वाली केमिस्ट्री फिल्म देखने की वजह बनती है।

By admin

Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)