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वोट चोरी के आरोपों पर भड़के निशिकांत दुबे, राहुल गांधी पर सनसनीखेज हमला

राहुल गांधी और निशिकांत दुबे राहुल गांधी और निशिकांत दुबे

कांग्रेस के प्रमुख नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर वोट चोरी के गंभीर आरोप लगाकर बीजेपी और चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। गुरुवार (18 सितंबर) को कर्नाटक के आलंद विधानसभा क्षेत्र का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस समर्थक मतदाताओं को निशाना बनाने के लिए फर्जी आवेदनों के जरिए 6,018 नामों को मतदाता सूची से हटाने की साजिश रची गई। राहुल ने कहा कि यह काम किसी एक व्यक्ति के हाथों नहीं, बल्कि सॉफ्टवेयर के माध्यम से केंद्रीकृत और सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, जो लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने वाली चाल है।

इन सनसनीखेज दावों पर बीजेपी ने कड़ा प्रहार किया और राहुल पर बड़ी साजिश रचने का इल्जाम ठोका। झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने तीखे लहजे में सवाल उठाया कि क्या राहुल गांधी ने 2023 की अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के उन सलाहकारों से गुप्त मुलाकात की थी, जिन्होंने 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने में भूमिका निभाई थी? दुबे का यह बयान सियासी हलकों में आग की तरह फैल गया।

लोकतंत्र को कुचलने की साजिश? – निशिकांत दुबे का धमाकेदार तंज

निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक तीखा पोस्ट साझा करते हुए लिखा, “क्या राहुल गांधी उस झूठी ‘संविधान बचाओ’ की कहानी गढ़कर चुनावी हार के बाद अब चुनाव आयोग पर उंगली उठाकर लोकतंत्र को ही खत्म करने की फिराक में हैं? मैं सभी जानकारियां प्रमाण सहित संसद के शीतकालीन सत्र में उजागर करूंगा। साजिश, साजिश और चंद्रकांता उपन्यास जैसी लंबी कहानी!” दुबे ने आगे कहा, “क्या राहुल गांधी जी ने 2023 की अमेरिका यात्रा में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन के उन सलाहकारों से व्हाइट हाउस में मुलाकात की थी, जिन्होंने 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित किया था? क्या राहुल गांधी जी उस सलाह यानि संविधान बचाओ की झूठी कहानी गढ़कर हारने के बाद…”

बीजेपी सांसद ने चेतावनी भरे लहजे में कहा, “आज राहुल गांधी अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने वाली साजिश का हिस्सा बनने वाले हैं। मैं गृह मंत्रालय और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से अपील करता हूं कि 2004 से 2025 तक अमेरिका में रहकर कांग्रेस को संचालित करने वाले सैम पित्रोदा की पूरी फंडिंग, उनकी मुलाकातों और राहुल गांधी को विदेशी दौरों पर किन-किन लोगों से मिलवाने की जांच होनी चाहिए। कांग्रेस ने भिंडरावाले का समर्थन किया, 1967 में कम्युनिस्टों के साथ मिलकर तिरुपति से पशुपतिनाथ तक नक्सलवाद को जन्म दिया, और अब सोरोस, रॉकफेलर, यूएसएआईडी जैसे विदेशी ताकतों के साथ मिलकर देश में अराजकता का तांडव मचाना चाहते हैं।”

यह विवाद यूपीए और एनडीए के बीच तल्खी को नई ऊंचाई दे रहा है, जहां दोनों पक्ष एक-दूसरे पर लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ के आरोप लगा रहे हैं। संसद के शीतकालीन सत्र में इस मुद्दे पर और गरमागर्म बहस की उम्मीद की जा रही है।

By admin

Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)

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{“title_results”:[“कर्नाटक सरकार ने बेंगलुरु घनघोर भगदड़ मामले में तीन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मामले वापस लिए”],”content_results”:[“कर्नाटक सरकार ने बेंगलुरु स्टेडियम भगदड़ मामले में तीन आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हटाईकर्नाटक सरकार ने मंगलवार को 2025 में बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुई भगदड़ मामले में तीन भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों के खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही को औपचारिक रूप से बंद कर दिया। इस हादसे में 11 लोगों की मौत हुई थी और 50 से अधिक व्यक्ति घायल हुए थे।इस कदम के तहत सरकार ने पूर्व बेंगलुरु पुलिस आयुक्त बी दयानंद, पूर्व अतिरिक्त पुलिस आयुक्त विकाश कुमार विकाश और पूर्व उप पुलिस आयुक्त (सेंट्रल) शेखर एच टेक्कनवर को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। यह निर्णय अधिकारियों की लिखित सफाई और प्रशासनिक विभाग की सिफारिशों की समीक्षा के बाद लिया गया है।यह भगदड़ घटना 4 जून 2025 को चिन्नास्वामी स्टेडियम के गेट नंबर 3 पर हुई थी, जहां रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) की इंडियन प्रीमियर लीग जीत का जश्न मनाने के लिए बड़ी संख्या में प्रशंसक इकट्ठा हुए थे। घटना के तुरंत बाद, सरकार ने पांच पुलिस अधिकारियों को “अश्रीर और लापरवाह” होने के आरोप में निलंबित कर दिया था। इन अधिकारियों में दयानंद, विकाश, टेक्कनवर, असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस सी बालाकृष्ण और कजबन पार्क इंस्पेक्टर ए के गिरिश शामिल थे।28 जुलाई 2025 को विकाश को छोड़कर अन्य सभी अधिकारियों का निलंबन वापस ले लिया गया था। अतिरिक्त पुलिस आयुक्त विकाश ने इस निलंबन को चुनौती देने के लिए केंद्रीय प्रशासनिक त्रिपाठी न्यायाधिकरण (CAT) का रुख किया, जिसने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और सरकार को निर्देश दिया कि वे उनके साथ भी समान व्यवहार करें। इसके बाद राज्य सरकार ने उनकी निलंबन की स्थिति को समाप्त कर दिया।यह निर्णय पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी और प्रशासनिक प्रक्रिया की गहन जांच के बाद लिया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि मामले में कोई ऐसी लापरवाही नहीं पाई गई जिससे अनुशासनात्मक कार्रवाई आवश्यक हो। इस मामले की समीक्षा से यह भी स्पष्ट हुआ कि पूर्व में लिए गए निर्णयों में न्यायसंगत कारणों की कमी थी।सरकार की यह कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया और तर्कसंगत निर्णय के पक्ष में एक मजबूत संदेश है। साथ ही, यह घटनाओं के प्रति प्रशासनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही के मानकों को संतुलित करने का प्रयास भी है।”]}