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‘Tujhya Aaila’ Review: बचपन की मासूम दुनिया के पीछे छिपी कड़वी सच्चाइयों की कहानी

Sub-headline: सुझय दहाके की मराठी फिल्म दोस्ती, स्कूल, गालियों और बचपन के एक अजीब खेल के जरिए ग्रामीण समाज की कई परतों को सामने लाती है।

मुंबई: निर्देशक सुझय दहाके की मराठी फिल्म ‘Tujhya Aaila’ बचपन की यादों को एक अलग और असहज नजरिए से देखने की कोशिश करती है। फिल्म में स्कूल, नए दोस्त और बच्चों के खेल जैसी परिचित चीजें हैं, लेकिन इनके बीच जाति, धर्म, हिंसा, अपमान और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दे भी धीरे-धीरे उभरते हैं।

फिल्म की कहानी अविनाश (सोहम बाबर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने पिता की नौकरी के सिलसिले में परिवार के साथ सतारा के एक गांव में पहुंचता है। शहर से आए अविनाश के लिए गांव और वहां का स्कूल बिल्कुल नई दुनिया है। उसकी मां (राजश्री देशपांडे) भी इस बदलाव से सहज नहीं हो पातीं।

गांव के सरकारी स्कूल में एक शिक्षक कई विषय संभालता है और बच्चों की अपनी अलग दुनिया है। इसी माहौल में अविनाश की दोस्ती देव्या (हृषिकेश वानखेडे) और चांद (जैद शेख) से होती है। दूसरी तरफ स्कूल का दबंग बच्चा खांड्या (अभिषेक झेंडे) उसके लिए चुनौती बनकर सामने आता है।

फिल्म का केंद्रीय तत्व बच्चों का एक अजीब खेल है, जिसमें “Tujhya Aaila” से वाक्य शुरू करके उसके आगे अलग-अलग शब्द जोड़े जाते हैं। पहली नजर में यह बच्चों की सामान्य शरारत लग सकती है, लेकिन निर्देशक इसी खेल के जरिए उनके बीच मौजूद प्रतिस्पर्धा, अपमान और आक्रामकता को सामने लाते हैं।

बचपन का दूसरा चेहरा

‘Tujhya Aaila’ बचपन को सिर्फ मासूम और खूबसूरत यादों तक सीमित नहीं करती। यहां बच्चे भी अपने आसपास के समाज से प्रभावित हैं। उनकी बातचीत में गालियां हैं, उनके खेलों में हिंसा है और उनके व्यवहार में जाति एवं धर्म से जुड़े सामाजिक अंतर दिखाई देते हैं।

फिल्म का सरकारी स्कूल एक छोटे समाज की तरह काम करता है, जहां व्यवस्था की कमियां और सामाजिक पूर्वाग्रह बच्चों की दुनिया में भी दिखाई देते हैं। शिक्षक कदम (संभाजी भगत) का चांद के प्रति व्यवहार इसी सामाजिक विभाजन की ओर इशारा करता है।

खांड्या का व्यवहार भी सिर्फ एक ‘बुली’ के रूप में नहीं दिखाया गया है। उसके पीछे की परिस्थितियों को कहानी धीरे-धीरे सामने लाती है। हालांकि, उसके किरदार को और विस्तार मिलता तो उसका भावनात्मक प्रभाव अधिक गहरा हो सकता था।

खूबसूरत फ्रेम्स, असहज माहौल

विजय मिश्रा की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के ग्रामीण परिवेश को खूबसूरत रोशनी और सादे लेकिन प्रभावशाली फ्रेम्स में कैद करती है। स्क्रीन पर दिखाई देने वाली प्राकृतिक खूबसूरती और कहानी में मौजूद कठोरता के बीच एक दिलचस्प विरोधाभास बनता है।

सुझय दहाके ने स्कूल और बचपन की दुनिया को इससे पहले ‘Shala’ में भी explore किया था। ‘Tujhya Aaila’ में भी स्कूल कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इस बार माहौल ज्यादा कच्चा, हिंसक और सामाजिक रूप से असहज है।

Tujhya Aaila Official Trailer:

कहानी की ताकत और सीमाएं

नियाज मुजावर की पटकथा पारंपरिक linear narrative के बजाय अलग-अलग घटनाओं के जरिए आगे बढ़ती है। केंद्रीय खेल इन घटनाओं को जोड़ने वाली कड़ी बनता है। इस वजह से फिल्म किसी सीधी कहानी की बजाय बचपन की बिखरी हुई याद जैसी महसूस होती है।

हालांकि, यही तरीका कुछ जगह फिल्म की कमजोरी भी बनता है। कुछ किरदारों, खासकर खांड्या, को अधिक गहराई देने की गुंजाइश महसूस होती है। फिल्म का छोटा रनटाइम कहानी को चुस्त बनाए रखता है, लेकिन कुछ भावनात्मक पहलुओं को विस्तार मिलने की संभावना भी नजर आती है।

कलाकारों का प्रदर्शन

सोहम बाबर ने अविनाश के किरदार में सहज अभिनय किया है। उनके साथ नजर आने वाले युवा कलाकार भी फिल्म के माहौल को विश्वसनीय बनाए रखते हैं। संभाजी भगत की मौजूदगी अलग ध्यान खींचती है, हालांकि शिक्षक कदम का किरदार अधिक प्रभावशाली तरीके से विकसित किया जा सकता था।

सिर्फ 84 मिनट की अवधि में ‘Tujhya Aaila’ बचपन, दोस्ती और स्कूल की कहानी के बहाने ग्रामीण समाज की कई परतों को छूती है।

निष्कर्ष

‘Tujhya Aaila’ एक ऐसी फिल्म है जो बचपन की यादों को सिर्फ nostalgia के नजरिए से नहीं देखती। फिल्म हंसी-मजाक और बच्चों की शरारतों के बीच छिपे अपमान, डर, सामाजिक भेदभाव और हिंसा को भी सामने लाती है। इसकी कहानी और प्रस्तुति कई जगह असामान्य जरूर लगती है, लेकिन यही असामान्यता फिल्म को अपनी अलग पहचान देती है।

‘Tujhya Aaila’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है।

By admin

Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)