मुंबई, महाराष्ट्र
विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताओं ने रुपया कमजोर बनने का सिलसिला बढ़ा दिया है। विदेशी पूंजी निवेशकों के घरेलू शेयर बाजार से बाहर निकलने के कारण रूपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 56 पैसे गिरकर 93.39 पर बंद हुआ। इस गिरावट के पीछे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की सुरक्षा को लेकर बढ़ती अनिश्चितताएं मुख्य वजह मानी जा रही हैं।
विदेशी मुद्रा विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिकी सरकार द्वारा ईरान के बंदरगाहों पर नाकेबंदी की घोषणा ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज के खुलने की संभावनाओं पर संदेह बढ़ा दिया है। यह जलमार्ग तेल की एक अहम आपूर्ति मार्ग है, और इसकी सुरक्षा में किसी भी तरह की बाधा से वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। इस स्थिति ने विदेशी पूंजी निवेशकों को भारतीय इक्विटी बाजार से पैसे वापस लेने के लिए प्रेरित किया है, जिससे घरेलू बाजार कमजोर हो गया है और रूपया दबाव में आया है।
मालूम हो कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से दुनिया में तेल का लगभग एक-पांचवां भाग गुजरता है। अमेरिका की इस नयी नीति से तेल की आपूर्ति में संभावित रुकावट की आशंका है, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतें ऊपर जा सकती हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय व्यापारियों और निवेशकों की चिंता बढ़ती है क्योंकि भारत काफी हद तक तेल आयात पर निर्भर है।
इकोनॉमिक विशेषज्ञों का कहना है कि इन भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय रुपया 2024 में और अस्थिर रह सकता है। विदेशी निवेशकों का भरोसा तभी जीवित रहेगा जब स्थानीय और वैश्विक स्तर पर स्थिरता दिखाई दे। मौजूदा वक्त में, रुपए की कमजोरी घरेलू बाजारों में निवेशकों की अनिश्चितता को दर्शाती है।
सरकार और केंद्रीय बैंक को इस स्थिति का मुकाबला करने के लिए सावधानीपूर्वक रणनीति अपनानी होगी ताकि विदेशी निवेशकों का विश्वास वापस लाया जा सके। आर्थिक विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि ऊर्जा आयात लागत पर नियंत्रण और निर्यात को बढ़ावा देना विदेशी पूंजी को आकर्षित कर सकता है।
इस बीच, निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे बाजार की स्थिति को ध्यान से समझे और सूचित फैसले लें। रुपया और शेयर बाजारों की चाल अगले कुछ हफ्तों में वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार बढ़ती-अटकी रहेगी।