न केवल 19 मासूम बच्चों के हत्यारों को सजा नहीं मिल सकी, बल्कि उनके परिजनों की न्याय की उम्मीद भी हमेशा के लिए खत्म हो गई। आरुषि हत्याकांड की तरह ही निठारी केस की सच्चाई अब शायद कभी सामने नहीं आएगी। यह मामला पुलिस और सीबीआई की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।
अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंधेर और कोली—दोनों को 12 मामलों में बरी कर दिया था।
पंधेर जुलाई 2025 में अंतिम मामले में भी बरी होकर जेल से बाहर आ गया, जबकि कोली की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया।
अब सुप्रीम कोर्ट ने भी कोली को अंतिम मामले में दोषमुक्त कर दिया है। कमजोर साक्ष्य और अधूरी फोरेंसिक जांच का पूरा फायदा आरोपियों को मिला। दोनों एजेंसियां अदालत में ठोस वैज्ञानिक प्रमाण पेश नहीं कर सकीं। परिणामस्वरूप, जिन परिवारों को अपने बच्चों के हत्यारों से न्याय की उम्मीद थी, उनकी उम्मीदें अधूरी रह गईं। गौतमबुद्ध नगर जिला जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे सुरेंद्र कोली के बुधवार तक जेल से बाहर आने की संभावना है।
यह मामला 29 दिसंबर 2006 को सामने आया था, जब निठारी गांव में पंधेर के घर के पीछे नाले से आठ बच्चों के कंकाल बरामद हुए थे।
सुरेंद्र कोली पंधेर का घरेलू सहायक था। दोनों पर बच्चों की हत्या और दुष्कर्म के आरोप लगे।
पहले नोएडा पुलिस ने जांच की, लेकिन दस दिन बाद केस सीबीआई को सौंप दिया गया। कंकाल बरामद करने की कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, आरोपियों की मेडिकल जांच भी नहीं हुई।
कोठी से केवल बाथरूम में कुछ खून के निशान मिले, जबकि बाकी जगहों से हत्या के कोई प्रमाण नहीं मिले।
मांस और हड्डियों के टुकड़े भी बरामद नहीं हुए। कबूलनामों में बताया गया कि शवों को कई घंटे तक बाथरूम में रखा जाता था, लेकिन इसका कोई ठोस सबूत कोर्ट में नहीं दिया गया।
कबूलनामे की ऑडियो-वीडियो क्लिप नकली निकली और दस्तावेजों पर सुरेंद्र कोली के हस्ताक्षर तक नहीं थे।
सीबीआई यह साबित करने में भी असफल रही कि दोनों का मानव अंगों की तस्करी से कोई संबंध था। 29 दिसंबर 2006: निठारी गांव में पंधेर की कोठी के पीछे नाले से 19 बच्चों और महिलाओं के कंकाल मिले। 11 जनवरी 2007: जांच सीबीआई को सौंप दी गई। टीम ने 30 और हड्डियां बरामद कीं। 22 मई 2007: सीबीआई ने पहला चार्जशीट दाखिल किया — पंधेर पर हल्के, कोली पर दुष्कर्म और हत्या के आरोप लगाए। 13 फरवरी 2009: 14 वर्षीय रिम्पा हालदार की हत्या और दुष्कर्म केस में दोनों को मौत की सजा मिली। 11 सितंबर 2009: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंधेर को बरी किया। 20 जुलाई 2014: राष्ट्रपति ने कोली की दया याचिका खारिज की। 08 सितंबर 2014: रात एक बजे कोर्ट ने कोली की फांसी पर रोक लगाई। 24 जुलाई 2017: पिंकी सरकार हत्या केस में दोनों को दोषी ठहराया गया। पीड़िता ज्योति के पिता झब्बू लाल और मां सुनीता ने सिस्टम पर गुस्सा जताते हुए कहा कि उनकी बेटी मेधावी थी और डॉक्टर बनना चाहती थी।
अब उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि जिन्हें शुरुआत से दोषी बताया गया था, वही आज आज़ाद हैं।
उनका सवाल है — अगर वे निर्दोष हैं, तो हमारे बच्चों की जान किसने ली?

