दिल्ली हाई कोर्ट ने विवाहित महिलाओं की अप्राकृतिक मौत के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने में होने वाली देरी और पुलिस की लापरवाही पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों को न्याय के लिए लंबे समय तक भटकना नहीं पड़ना चाहिए। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने सभी ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि दहेज प्रताड़ना और अप्राकृतिक मौत से जुड़ी याचिकाओं को प्राथमिकता के आधार पर सूचीबद्ध कर जल्द सुनवाई की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज कराने और जांच शुरू करने संबंधी अर्जियों को महीनों तक लंबित रखना उचित नहीं है। यह टिप्पणी एक दहेज मौत मामले की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें शादी के छह महीने के भीतर युवती की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। अदालत ने पति और सास-ससुर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता पड़ सकती है। पीठ ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि घटनास्थल से टूटी चूड़ियां और पायल के टुकड़े मिलने के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की और मामले को लंबे समय तक प्रारंभिक जांच में ही लंबित रखा। अदालत ने कहा कि भविष्य में ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि पीड़ित परिवारों को समय पर न्याय मिल सके।

