डिजिटल अधिनायकवाद की ओर लोकतंत्र का विलंबित मार्ग: भारत और इजरायल का उदाहरण
डिजिटल अधिनायकवाद वह स्थिति है जिसमें सरकारें प्रौद्योगिकी का उपयोग निगरानी और सेंसरशिप के लिए करती हैं ताकि असहमति को दबाया जा सके। यह प्रवृत्ति केवल निरंकुश राज्यों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब लोकतंत्र भी इस दिशा में बढ़ रहे हैं। भारत और इजरायल इस परिवर्तन की स्पष्ट झलक पेश करते हैं।
चीन इस क्षेत्र में सबसे अनुभवी है जहां व्यापक निगरानी और सेंसरशिप के साथ-साथ साइबर जासूसी, गलत सूचना और प्रभावी अभियानों का इस्तेमाल घरेलू एवं वैश्विक स्तर पर किया जा रहा है। लेकिन यह समस्या अब केवल मास्को या बीजिंग तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र भी अब ऐसी तकनीकों को लागू करके अपने नागरिकों की स्वतंत्रता सीमित कर रहे हैं और इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी निर्यात करने लगे हैं।
इजरायल: स्पायवेयर का निर्यात
इजरायल, जो एक लोकतंत्र है, यहाँ निजी कंपनियों को राज्य नियंत्रित व्यवस्था के तहत स्पायवेयर निर्यात करने की अनुमति है। इजरायली कंपनी एनएसओ ग्रुप द्वारा विकसित पेगासस स्पायवेयर को आतंकवाद विरोधी और गंभीर अपराध जांच के लिए सरकारी एजेंसियों को लाइसेंस प्राप्त उपकरण के रूप में विपणन किया जाता है।
हालांकि, कई जांचों ने इसे पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, वकीलों और राजनीतिक विरोधियों की निगरानी के साथ जोड़ा है। पेगासस ऐसे स्मार्टफोन में बिना किसी लिंक पर क्लिक किए प्रवेश कर सकता है और संदेशों, कॉलों, माइक्रोफोन और कैमरों तक पहुंच प्रदान कर सकता है।
इसका इस्तेमाल मेक्सिको में पत्रकारों, भारत में विपक्षी राजनेताओं और हंगरी में नागरिक समाज समूहों की निगरानी के लिए किया गया है। 2021 में इजरायल ने निर्यात नियम कड़े किए और केवल विश्वसनीय सरकारों को वैध उद्देश्यों के लिए बिक्री की अनुमति दी। फिर भी यह समस्या बरकरार है।
2025 की शुरुआत में यह जानकारी सामने आई कि पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बाराक द्वारा सह-स्थापित इजरायली स्पायवेयर कंपनी पारागन सोल्यूशंस ने एक शक्तिशाली निगरानी उपकरण विकसित किया जो संभावित रूप से मानवाधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए खतरा हो सकता है।
भारत और इजरायल जैसे लोकतंत्र यह दर्शाते हैं कि डिजिटल अधिनायकवाद के खतरे और व्यवहारिक खतरनाक दुष्प्रभाव दुनिया भर में कैसे फैल रहे हैं। पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के बिना तकनीकी विकास स्वतंत्रता के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। इस तेजी से बढ़ते परिदृश्य में लोकतंत्रों को अपनी मूलभूत स्वतंत्रताओं की सुरक्षा के प्रति सजग रहना होगा।