संशोधित ट्रांसजेंडर अधिकार कानून पर वरिष्ठ न्यायालयों में लंबित याचिकाओं की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को संशोधित ट्रांसजेंडर व्यक्ति संरक्षण अधिकार विधि की चुनौती देने वाली याचिकाओं के मामले में चार उच्च न्यायालयों में चल रही कार्यवाही को स्थगित कर दिया है।
चief जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस वी मोहन की बेंच ने यूनियन सरकार द्वारा दायर याचिकाओं में प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव रखा।
अभी राजस्थान, कर्नाटक, केरल और दिल्ली उच्च न्यायालयों में संशोधित कानून के खिलाफ याचिकाएं लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह इन सभी याचिकाओं को अपने सामने स्थानांतरित कर सकता है या उन्हें एकीकृत कर किसी एक उच्च न्यायालय को सौंप सकता है।
परliament ने 25 मार्च को 2026 के संशोधित ट्रांसजेंडर व्यक्ति संरक्षण अधिकार अधिनियम को मंजूरी दी, जबकि इसे एक चयनित संसदीय समिति को भेजने का प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया गया।
लोकसभा में 13 मार्च को पेश इस कानून में 2019 के अधिनियम में संशोधन कर ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा को पुनः परिभाषित किया गया है। यह संशोधन स्वयं की इच्छित लिंग पहचान के अधिकार को हटा चुका है और केवल उन लोगों तक इसके दायरे को सीमित करता है जिनके जैविक या शारीरिक लक्षण, अंतरलिंगी चरित्र या विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान जैसे किन्नर, हिजड़ा, अरवानी और जोग्टा हों।
कानून में कानूनी लिंग मान्यता के लिए चिकित्सा मूल्यांकन और प्रमाणपत्र अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही इस पहचान को अनुमोदित करने की अधिकारिता भी स्पष्ट की गई है।
यह संशोधन ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों एवं पहचान के सन्दर्भ में व्यापक चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है, जिससे संबंधित याचिकाएं विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अंतिम निर्णय के लिए सुनवाई की प्रक्रिया को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है।
इस रोक के चलते अभी उच्च न्यायालयों में चल रही सुनवाई स्थगित हो गई है, जो ट्रांसजेंडर अधिकारों के संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।