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नारेबाजी और भारी भीड़ से परे: जन्तर मंतर को संचालित करने वाले स्वयंसेवक

Beyond the slogans and the swelling crowd, the volunteers who keep Jantar Mantar running

जन्तर मंतर: नारेबाजी के परे, स्वयंसेवकों की भूमिका

दिल्ली का जन्तर मंतर केवल विरोध प्रदर्शन का मंच नहीं है, बल्कि इसे जीवित रखने वाले हजारों स्वयंसेवकों की भी एक अद्भुत कहानी है। ये सहयोगी बिना किसी सरकारी मदद के दिन-रात इस ऐतिहासिक स्थल की देखभाल करते हैं।

जन्तर मंतर, जो भारत की राजनीतिक चेतना का केंद्र है, यहाँ रोज़ाना बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जुटते हैं। परंतु, इस भीड़ के पीछे स्वयंसेवकों की मेहनत, समर्पण और समन्वय छुपा होता है, जो इसे सुचारू रूप से चलाते हैं। ये लोग सफाई, सुरक्षा, प्रशासनिक कार्यों तथा आपातकालीन स्थितियों से निपटने की जिम्मेदारी उठाते हैं।

स्वयंसेवकों का यह समूह भिन्न-भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आता है, जिनमें छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक शामिल हैं। उनकी एकता और प्रतिबद्धता से ही जन्तर मंतर का संचालन संभव हो पाता है। वे लगभग 24 घंटे इस स्थल पर रहे बिना कोई शिकायत के सेवा करते हैं।

यह आयोजन स्थल, प्रायः विभिन्न राजनीतिक दलों और समूहों के हितों का केंद्र बन जाता है, जहाँ कभी-कभी तनावपूर्ण स्थितियाँ भी उत्पन्न होती हैं। ऐसे में स्वयंसेवकों की भूमिका केवल प्रबंधन तक सीमित नहीं रहती; वे शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखने में भी सहायक होते हैं।

सरकारी संस्थाओं से सीमित सहायता मिलने के बाद भी, ये स्वयंसेवक संसाधनों का सदुपयोग करते हुए जन्तर मंतर की गरिमा और उसके उद्देश्य को बनाए रखने में जुटे हैं। उनके योगदान के बिना यह स्थल न केवल अस्त-व्यस्त हो सकता था, बल्कि वहाँ आयोजित विरोध प्रदर्शन भी अनियंत्रित हो सकते थे।

जन्तर मंतर के इतिहास और उसे चलाने वाली इस अद्भुत टीम की कहानी जनसाधारण में कम ही जानी जाती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम इस अमूल्य सेवा को समझें और सराहें। इनके बिना जन्तर मंतर केवल एक जगह होती, न कि लोकतंत्र के pulsating दिल की तरह।

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By admin

Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)