मुंबई में रात के समय तेज लाइटों और चमकते विज्ञापन बोर्डों से होने वाली परेशानी का मामला अब बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंच गया है। अदालत ने इस समस्या पर महाराष्ट्र सरकार और संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने चिंता जताई कि जरूरत से ज्यादा कृत्रिम रोशनी लोगों की नींद और सेहत पर बुरा असर डाल सकती है।
यह मामला खास तौर पर दक्षिण मुंबई के मरीन ड्राइव इलाके से जुड़ा है। यहां जिमखानों में लगी तेज फ्लडलाइट्स और विज्ञापन होर्डिंग्स की चमक से आसपास रहने वाले लोगों को परेशानी होने का आरोप लगाया गया है।
दक्षिण मुंबई के रहने वाले आईटी प्रोफेशनल और एस्ट्रोफोटोग्राफर नीलेश देसाई ने इस मामले में याचिका दाखिल की है। उनका कहना है कि अधिकारियों से कई बार शिकायत करने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने तेज कृत्रिम रोशनी के संभावित दुष्प्रभावों पर चिंता जताई। अदालत के मुताबिक, जरूरत से ज्यादा रोशनी लोगों की नींद का चक्र बिगाड़ सकती है और उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
इसका असर खासकर उन रिहायशी इलाकों में रहने वाले बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ सकता है, जहां रात में भी तेज रोशनी रहती है।
हाई कोर्ट ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) और संबंधित एजेंसियों को 1998 के आदेश का सख्ती से पालन कराने को कहा है। इस आदेश के तहत रात 11 बजे के बाद नियॉन लाइटें बंद की जानी चाहिए।
याचिका में कहा गया है कि जरूरत से ज्यादा रोशनी से लोगों के अलावा पेड़-पौधों और वन्यजीवों पर भी असर पड़ सकता है। इससे बिजली की बर्बादी होती है और वाहन चालकों को भी देखने में परेशानी हो सकती है।
याचिकाकर्ता ने रोशनी की अधिकतम सीमा तय करने, इसके इस्तेमाल का समय निर्धारित करने और नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों पर कार्रवाई के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने की मांग की है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर चार हफ्तों के भीतर हलफनामा दाखिल करने को कहा है। अब इस मामले में सरकार और संबंधित विभागों के जवाब पर नजर रहेगी।

