जाति गणना का दूसरा चरण : सरकारी सर्वेक्षण में खुला कॉलम, लेकिन आंकड़ों की उपयोगिता पर सवाल
6 जुलाई से देश के 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जनगणना 2027 के दूसरे चरण का प्री-टेस्ट शुरू है, जिसमें पहली बार 1931 के बाद जाति की गिनती की जाएगी। इस चरण का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक पहलुओं के साथ-साथ जातिगत जानकारी एकत्रित करना है।
इस प्री-टेस्ट फॉर्म में जाति के लिए एक खुला कॉलम शामिल है, जहाँ उत्तरदाता अपनी जाति स्वयं लिख सकेंगे। यह तरीका पहले 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में भी अपनाया गया था, लेकिन उस समय मिले डेटा में 46 लाख से अधिक भिन्न जाति नाम पाए गए, जिनमें कई बार एक ही जाति के विभिन्न नाम शामिल थे।
शासन द्वारा इस खुली कॉलम की उपयोगिता को लेकर सतर्कता बरती जा रही है क्योंकि 2011 के आंकड़ों की विविधता के कारण उन्हें नीति निर्धारण या आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कामों में अपनाना संभव नहीं हो पाया। इसके अलावा, विस्तृत, असंगठित और विश्लेषण को जटिल बनाने वाले आंकड़े नीति निर्माताओं के लिए मुसीबत बने।
सरकार ने प्री-टेस्ट के 20 जुलाई को समाप्त होने के बाद प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर आगामी जनगणना के लिए रणनीति तय करनी है, जिससे कि जाति की गिनती विश्वसनीय, उपयोगी तथा विधिवत हो सके। विशेषज्ञ यह मानते हैं कि आंकड़ों की गुणवत्ता और उनका प्रभावी विश्लेषण जनगणना की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक होगा।
जाति आधारित आंकड़े भारतीय सामाजिक संरचना और सरकारी नीतियों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए सही और मानकीकृत डेटा संग्रह की प्रक्रिया सुनिश्चित करना जरूरी है ताकि यह समाज के हित में सकारात्मक योगदान दे सके।
अंततः, इस नए तरीके के साथ चुनौती यह होगी कि खुला कॉलम किस प्रकार से डेटा को व्यवस्थित और विश्लेषण योग्य बनाता है, जिससे वह न्यायसंगत आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं के लिए कारगर साबित हो सके।