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दिल्ली: यहां लगेंगी सीएनसी अंडरफ्लोर व्हील लेथ मशीनें

परियोजना के तहत उत्तर रेलवे के कई प्रमुख डिवीजनों को शामिल किया गया है। दिल्ली डिपो और डीईएलटी (नई दिल्ली) डिपो में यह मशीनें स्थापित की जाएंगी, जो राजधानी क्षेत्र की व्यस्त ट्रेनों के रखरखाव का केंद्र हैं।

भारतीय रेलवे यात्रियों की सुरक्षा, सुविधा और ट्रेनों की परिचालन विश्वसनीयता बढ़ाने की दिशा में लगातार आधुनिक तकनीक को अपना रहा है। इसी क्रम में रेलवे के विभिन्न कोचिंग डिपो में सीएनसी (कंप्यूटर न्यूमेरिकल कंट्रोल) आधारित अंडरफ्लोर व्हील लेथ मशीनों की आपूर्ति, स्थापना और कमीशनिंग की जाएगी। 

इससे ट्रेनों व कोच के पहियों की मरम्मत को सटीक और तेजी से की जाएगी। योजना का मुख्य उद्देश्य ट्रेनों के पहियों के रखरखाव को अधिक सुरक्षित बनाना है। अभी तक कई जगहों पर पारंपरिक तरीकों से पहियों की मरम्मत में अधिक समय लगता है और कई बार बोगी को अलग करना पड़ता है। सीएनसी अंडरफ्लोर व्हील लेथ मशीनों के जरिए यह काम कहीं अधिक आधुनिक और प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा। इसकी खासियत यह है कि ट्रेन की बोगी को अलग किए बिना ही पहियों की प्रोफाइलिंग और मरम्मत की जा सकती है। 

दिल्ली सहित कई प्रमुख डिपो होंगे शामिल
परियोजना के तहत उत्तर रेलवे के कई प्रमुख डिवीजनों को शामिल किया गया है। दिल्ली डिपो और डीईएलटी (नई दिल्ली) डिपो में यह मशीनें स्थापित की जाएंगी, जो राजधानी क्षेत्र की व्यस्त ट्रेनों के रखरखाव का केंद्र हैं। इसके अलावा, फिरोजपुर डिपो, जम्मू डिवीजन का डीएमयू शेड बड़गाम और अंबाला डिवीजन का चंडीगढ़ डिपो भी सूची में हैं। इन स्थानों पर सीएनसी तकनीक से लैस अंडरफ्लोर व्हील लेथ लगने से स्थानीय स्तर पर रखरखाव की क्षमता बढ़ेगी। जम्मू और बड़गाम जैसे क्षेत्रों में, जहां मौसम और भौगोलिक चुनौतियां अधिक हैं। वहां यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी साबित होगी।

119 करोड़ की लागत से 12 माह में होगा पूरा काम
योजना की अनुमानित लागत करीब 119.70 करोड़ रुपये रखी गई है। इसको पूरा करने की समय-सीमा 12 माह तय की गई है। चयनित एजेंसी को एक वर्ष के भीतर मशीनों की आपूर्ति, स्थापना और पूरी तरह से चालू करने का कार्य करना होगा। इसके बाद संबंधित डिपो में पहियों का रखरखाव इसी आधुनिक तकनीक से किया जाएगा।

समय की बचत और सुरक्षा में होगी वृद्धि
सीएनसी अंडरफ्लोर व्हील लेथ एक हाई-टेक मशीन है। इसमें सेंसर और ऑटोमेटेड टूल्स लगे होते हैं जो पहियों की माप लेते हैं और आवश्यक कटिंग करते हैं। इस तकनीक से पूरी प्रक्रिया कुछ घंटों में पूरी हो जाती है। इससे सालाना लाखों रुपये की बचत होगी। तकनीकी खराबियों की संख्या कम होगी, जिससे ट्रेनों के बीच रास्ते में खराब होने या गति कम होने की समस्या घटेगी।

ट्रेन के पटरी से उतरने जैसी दुर्घटना की संभावना होगी कम
योजना का फोकस उत्तर भारत के प्रमुख डिपो पर है, जहां ट्रेनों का ट्रैफिक अधिक है। नई तकनीक से रखरखाव की लागत भी कम होगी। इससे पहियों की सतह चिकनी बनी रहती है। साथ ही कंपन कम होता है और ट्रेनों की गति स्थिर रहती है। इसके अलावा पहियों के पटरी से उतरने जैसी दुर्घटना की संभावना भी कम हो जाएगी।

By Ankshree

Ankit Srivastav (Editor in Chief )

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