लेकिन सीआईएसएफ की स्क्रीनिंग कमेटी ने बरी होने के आदेश को नजरअंदाज करते हुए केवल एफआईआर दर्ज होने के आधार पर चयन रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया यांत्रिक
हाईकोर्ट ने इसे यांत्रिक प्रक्रिया करार देते हुए कहा कि चयन समितियों का दायित्व है कि वे बरी होने के आदेश को ध्यान से पढ़ें और यह समझें कि व्यक्ति को सम्मानजनक तरीके से बरी किया गया है या सिर्फ संदेह का लाभ देकर छोड़ा गया है। कोर्ट ने कहा कि पुराने मुकदमे के आधार पर व्यक्ति को आजीवन दंडित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव निषेध) और 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन है। कोर्ट ने सीआईएसएफ को निर्देश दिया कि वह अभ्यर्थी को तुरंत कांस्टेबल के रूप में नियुक्ति दे और पिछले वेतन-भत्तों सहित सभी लाभ प्रदान करे।

