एमपी के आदिवासी किसानों की जमीन डिजिटल रिकॉर्ड से गायब, बढ़ रही आशंकाएं
मध्य प्रदेश के खरोंगे जिले के दगड़खेड़ी गांव में आदिवासी किसानों की जमीन डिजिटल भू-अभिलेखों से गायब होने की स्थिति ने स्थानीय समुदाय में चिंता बढ़ा दी है। करीब 40 परिवारों के पास उनके स्वामित्व के स्पष्ट दस्तावेज हैं, लेकिन ऑनलाइन पोर्टल पर उनकी भूमि की जानकारी उपलब्ध नहीं है। अकला चमार, 80 वर्षीय किसान, जिन्होंने दो दशकों से अपने 2.23 हेक्टेयर जमीन पर अधिकार के दस्तावेज संभाले हुए हैं, वे स्वयं इस विसंगति का शिकार हैं। उनके पास छोटे किसानों के लिए राज्य राजस्व विभाग द्वारा 2001 में जारी भूमि अधिकार और ऋण पुस्तिका भी मौजूद है, जिसमें स्थानीय तहसीलदार के हस्ताक्षर और ऋण विवरण हैं। फिर भी, जब वे एमपी भूलेख पोर्टल पर अपने नाम या खसरा नंबर से खोज करते हैं, तो कोई जानकारी सामने नहीं आती। दगड़खेड़ी समेत आसपास के बरैला और भील आदिवासी किसान परिवार भी इस समस्या का सामना कर रहे हैं। यह समस्या न केवल व्यक्तिगत असमंजस का कारण है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी बड़े संकट का संकेत है। जमीन का अधिकार और उसको लेकर सुरक्षित रिकॉर्ड किसी भी किसान के लिए सुरक्षा और पहचान का आधार होता है। जब ये दस्तावेज डिजिटल माध्यम से गायब हो जाते हैं, तो वे अपनी जमीन की वैधता और ऋण संबंधी मामलों में बाधाओं का सामना करते हैं। राज्य सरकार और संबंधित विभागों को इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए स्थिति का त्वरित समाधान निकालना आवश्यक है, ताकि आदिवासी किसानों के मौलिक अधिकारों की रक्षा हो सके और उन्हें न्याय के लिए संघर्ष न करना पड़े। इस समस्या का व्यापक समाधान तभी संभव है जब डिजिटल रिकॉर्डिंग प्रणालियों में पारदर्शिता एवं सटीकता सुनिश्चित की जाए, और जमीन के वास्तविक स्वामित्व को तकनीकी त्रुटियों से मुक्त रखा जाए। आदिवासी समुदाय के लिए यह सुरक्षा और न्याय की प्राथमिकता होनी चाहिए।
अकला की तरह, दगड़खेड़ी के करीब 40 बरैला और भील आदिवासी किसान परिवार भी इसी समस्या का सामना कर रहे हैं। इनके पास खेती योग्य भूमि के स्वामित्व को प्रमाणित करने वाली भूमि अधिकार और ऋण पुस्तिकाएँ हैं।

