मध्य प्रदेश में यूनीफॉर्म सिविल कोड पैनल की आदिवासी समुदाय को बिल से बहार रखने की सिफारिश
मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार द्वारा गठित एक समिति ने आदिवासियों को प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की है। यह रिपोर्ट मंगलवार को PTI ने प्रकाशित की है।
यूसीसी का उद्देश्य सभी नागरिकों के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण से संबंधित मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। वर्तमान में, विभिन्न समुदायों के व्यक्तिगत कानून उनके धार्मिक ग्रंथों पर आधारित होते हैं, जो धर्म के अनुसार भिन्न होते हैं।
इस समिति के प्रमुख रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज रंजना प्रकाश देसाई हैं, जिन्होंने सोमवार को मुख्यमंत्री मोहन यादव को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद इसे विधि विभाग को भेज दिया गया। देसाई इसी तरह की समितियों का नेतृत्व पहले भी कर चुकी हैं, जिनमें उत्तराखंड और गुजरात के लिए यूसीसी का मसौदा तैयार करना शामिल है। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने भी इस दिशा में एक समिति गठित की है, जिसकी अध्यक्षता देसाई कर रही हैं।
मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र की शुरुआत 20 जुलाई से हो रही है, जिसमें कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद यूसीसी बिल पेश किया जा सकता है। पैनल को विवाह, तलाक, भरण-पोषण, विरासत, दत्तक ग्रहण और सहवास जैसे विषयों पर मौजूदा कानूनों का अध्ययन कर राज्य की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार मसौदा तैयार करने का कार्य सौंपा गया था।
सरकार के बयान के अनुसार, समिति ने अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने की सलाह दी है। यह कदम आदिवासी समुदाय की विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाओं को ध्यान में रखकर लिया गया है।
यह सिफारिश विवादित हो सकती है क्योंकि यूसीसी के समर्थक समान नागरिक संहिता को लागू करके सभी समुदायों के लिए एकसमान कानून चाहते हैं। वहीं, आदिवासी समुदाय की अलग पहचान और उनके विशेष अधिकारों की रक्षा करने वाले भारतीय संविधान के प्रावधान भी महत्व रखते हैं। इस बीच विधायिका और प्रशासन दोनों इस पर आगे की जांच और विचार कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश में यूसीसी को लागू करने की यह प्रक्रिया राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है, क्योंकि यह पूरे देश में व्यक्तिगत कानूनों के एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।