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मालाड स्टेशन पर प्रोफेसर की हत्या: महिला यात्री को उतरने देने पर भड़का आरोपी, लोकल ट्रेन में मामूली बात बनी जानलेवा

मुंबई के मालाड रेलवे स्टेशन पर यूपी मूल के 33 वर्षीय प्रोफेसर आलोक कुमार सिंह की हत्या ने सबको झकझोर दिया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि उन्होंने भीड़भाड़ के बीच पहले एक महिला यात्री को उतरने का रास्ता दिया, जिससे पीछे खड़ा युवक भड़क गया और बात हिंसा तक पहुंच गई।

प्रत्यक्षदर्शी के मुताबिक, आलोक के पीछे उनके सहयोगी प्रोफेसर सुधीर त्रिवेदी खड़े थे और उनके पीछे आरोपी ओमकार शिंदे (27) मौजूद था। डिब्बे में भारी भीड़ थी और दोनों ओर महिला यात्री भी खड़ी थीं। इसी दौरान उतरने को लेकर धक्का-मुक्की हुई और आरोपी ने गुस्से में हमला कर दिया।

पुलिस के अनुसार, ओमकार ने मेटल पॉलिश करने वाले नुकीले औजार ‘पॉलिश पाना’ से आलोक के पेट के बाईं ओर वार किया और ट्रेन से उतरकर फरार हो गया। पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि उसे अंदाजा नहीं था कि वार इतना गंभीर होगा। घटना के बाद वह पीछे मुड़-मुड़कर देखता रहा, लेकिन शोर बढ़ता देख आरओबी के रास्ते कुरार विलेज की ओर भाग निकला।

ओमकार कुरार विलेज का रहने वाला है और रोज मालाड से चर्चगेट जाने वाली लोकल पकड़कर चर्नी रोड स्थित पॉलिश फैक्ट्री में काम करने जाता था। रविवार को जब वह काम पर जाने के लिए घर से निकला, तो पहले से निगरानी कर रही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, हमले में इस्तेमाल किया गया औजार अब तक बरामद नहीं हुआ है।

बोरीवली जीआरपी के वरिष्ठ पीआई दत्ता खुपेकर ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज की मदद से संदिग्ध की पहचान की गई। फुटेज में एक व्यक्ति बैग लटकाए प्लेटफॉर्म नंबर 1 से पूर्व दिशा की ओर जाने वाले फुटओवर ब्रिज पर भागता दिखा।

जानकारी के अनुसार, शनिवार शाम आलोक अपने सहयोगी सुधीर त्रिवेदी के साथ विले पार्ले स्थित एनएम कॉलेज से निकले थे। दोनों अंधेरी स्टेशन पहुंचे और वहां से बोरीवली स्लो लोकल में सवार हुए। सुधीर को विरार जाना था, जबकि आलोक को मालाड उतरकर प्रभात नगर स्थित अपने घर जाना था। शाम करीब 5:25 बजे वे भीड़भाड़ वाले डिब्बे में दरवाजे के पास खड़े थे, तभी यह घटना हुई।

आलोक के परिजनों ने स्टेशन की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि घटना के समय आरपीएफ और जीआरपी की मौजूदगी क्यों नहीं थी और स्टेशन पर तत्काल चिकित्सा सुविधा क्यों उपलब्ध नहीं थी। परिवार का आरोप है कि घायल को तुरंत इलाज देने के बजाय पुलिस औपचारिकताओं में लगी रही। हालांकि पुलिस का कहना है कि 45-46 मिनट के भीतर आलोक को कांदिवली के शताब्दी अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

आलोक के परिजनों का कहना है कि वह बेहद शांत और सहृदय स्वभाव के थे और कभी विवाद में नहीं पड़ते थे। एक मामूली सी बात पर इस तरह की हिंसा ने परिवार और परिचितों को गहरे सदमे में डाल दिया है।

By admin

Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)