नोएडा और ग्रेटर नोएडा में दूषित पेयजल एक गंभीर समस्या बन गया है। गलगोटिया विश्वविद्यालय और एकेटीयू के एक अध्ययन में पानी में क्रोमियम और कैडमियम की खतरनाक मात्रा पाई गई, जिससे कैंसर का खतरा बढ़ रहा है। अधिकारियों पर सतही जांच और कार्रवाई में देरी का आरोप है। यदि स्वच्छ पेयजल सुनिश्चित करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो कैंसर, किडनी फेलियर और सांस संबंधी बीमारियों का प्रकोप बढ़ सकता है।
सोसायटियों वाले नोएडा एवं ग्रेटर नोएडा की चकाचौंध के पीछे कड़वी सच्चाई छिपी है। यहां लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर घर खरीदने वाले लोग मूलभूत सुविधाओं के ही लिए नहीं, बल्कि पेयजल को भी तरस रहे हैं। इंदौर में दूषित पानी पीने से हुई 17 लाेगों की मौत के बाद लोगों में भय का माहौल है। घर का पानी कितना सुरक्षित लोग जिम्मेदारों से इसकी गारंटी मांग रहे हैं
सेक्टर सोसायटी से लेकर ग्रामीण अंचलों तक पेय जलापूर्ति के साथ जांच कराने की जिम्मेदारी नोएडा- ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की है। लोगों का आरोप है कि शिकायत मिलने पर प्राधिकरण ज्यादातर सोसायटियों में टीडीएस की बाजीगरी से पेयजल की गुणवत्ता के मानक तय कर लिए जाते हैं। आक्रोश जताने व दूषित पानी पीने से ज्यादा लोगों के बीमार हो जाने का मामला उजागर हो जाने पर नोएडा स्थित एक निजी लैब में जांच के नमूने भेजकर कार्रवाई का आश्वासन देते हुए अधिकारी इतिश्री कर लेते हैं।
रिपोर्ट में पानी की गुणवत्ता सही बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया जाता है। जबकि हकीकत कुछ ओर ही बयां कर रही है। अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गलगोटिया विश्वविद्यालय और डाॅक्टर एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक (एकेटीयू ) के विज्ञानियों ने पिछले दो साल में एक संयुक्त अध्ययन कर पांच गांवों से पेयजल के नमूने एकत्र कर प्रयोगशाला में जांच कराई थी। जिसकी रिपोर्ट दिसंबर में ही आई। विज्ञानियों का दावा है कि मानसून के बाद पानी में क्रोमियम की मात्रा निर्धारित सुरक्षित मानक से लगभग 60 गुना अधिक मिली।