अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ अब्दुल गनी और श्रेय पाठक का कहना है कि अरावली की चट्टानें भूजल रिचार्ज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन खनन से रिसाव मार्ग बाधित हो रहे हैं, जिससे प्रदूषक भूजल में घुल रहे हैं। अध्ययन में स्थायी खनन, भूजल प्रबंधन और पुनर्भरण परियोजनाओं की तत्काल जरूरत पर जोर दिया गया है। कुल जोखिम सूचकांक अधिक
अध्ययन में भारी धातुओं के प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य जोखिम मूल्यांकन (एचएचआरए) भी किया गया, जिसमें अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) मॉडल का उपयोग हुआ। इसके परिणाम बेहद चिंताजनक हैं। कुल जोखिम सूचकांक (टीएचआई) शिशुओं के लिए 0.86 से 49.25, बच्चों के लिए 0.39 से 33.62, किशोरों के लिए 0.18 से 15.71 और वयस्कों के लिए 0.16 से 13.72 तक रहा। अंतर्ग्रहण (पीने) और त्वचीय संपर्क दोनों से स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा हुआ है, जिसमें कैंसर का खतरा भी शामिल है। भू-स्थानिक मानचित्रण से पता चला कि प्रदूषण के हॉटस्पॉट अरावली के खनन क्षेत्रों, भूवैज्ञानिक कमजोरियों से जुड़े हैं। खनन से छोटी पहाड़ियों के खत्म होने की थी आशंका
नई परिभाषा के बाद दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में से एक अरावली पहाड़ियों के अवैध खनन की आशंका से खत्म होने की लोगों की चिंता के चलते सुप्रीम कोर्ट को अपना फैसला बदलना पड़ा। स्थानीय लोग और पर्यावरणविद इस आधार पर इसका विरोध कर रहे थे कि दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली 12081 पहाड़ियों में से केवल 1048 ही 100 मीटर की नई परिभाषा के दायरे में आती हैं। अगर नई परिभाषा को मान्यता दी गई तो छोटी पहाड़ियां खनन से समाप्त हो जाएंगी और इस तरह व्यावहारिक रूप से अरावली का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। शीर्ष कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए उन्होंने मांग की कि मामले की समीक्षा के लिए बनने वाली नई समिति में केवल नौकरशाह नहीं, बल्कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी के विशेषज्ञ भी होने चाहिए। पर्यावरणविद भवरीन कंधारी ने कहा कि जिस तरह से अरावली में खनन हो रहा है, वह प्रशासनिक और शासन की नाकामी है। न्यायिक हस्तक्षेप बहुत जरूरी था। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश पर रोक लगाना एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन नई समिति में नौकरशाहों के अलावा पारिस्थितिकीविद् और पर्यावरणविदों को भी शामिल किया जाना चाहिए। अरावली के सुरक्षित होने तक आंदोलन रहेगा जारी
पीपल फॉर अरावली समूह की संस्थापक सदस्य नीलम अहलूवालिया ने कहा कि असली जरूरत अरावली में सभी खनन गतिविधियों पर पूर्ण रोक की है। पूरे क्षेत्र के लिए स्वतंत्र और विस्तृत पर्यावरण व सामाजिक प्रभाव आकलन जरूरी है, ताकि अब तक हुए नुकसान का सही आकलन हो सके।

