झारखंड में ‘डायन’ हत्या और ‘लव जिहाद’ की मिथक कहानी का सामाजिक पहलू
झारखंड भारत में ‘डायन’ हत्या के मामले सबसे ज्यादा देखे जाते हैं, जिनमें महिलाओं को ‘डायन’ कहकर पीटा जाता है और मार दिया जाता है। ये घटनाएं ज़्यादातर आदिवासी और निचली जाति की महिलाओं के साथ होती हैं, जिसके पीछे गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक जड़ें हैं।
इस रिपोर्ट में, स्क्रोल की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा ने संवाददात्री नोलिना मिंज से बातचीत की, जो आदिवासी भूमि के जबरन छिनने और उनकी आर्थिक दशा के कारणों को लेकर विस्तार से बताती हैं, जो ‘डायन’ हत्या जैसी कुप्रथाओं को जन्म देती हैं।
आदिवासी जमीन की हानि से जुड़ी आशंकाएँ महिलाओं को उनकी वैध संपत्ति से वंचित कर देती हैं, जिससे वे और भी कमजोर हो जाती हैं। इसी बीच, कुछ समुदायों में ‘लव जिहाद’ और ‘भूमि जिहाद’ जैसे संदेहात्मक नरेटिव्स फैलाए जाते हैं, जिनमें मुस्लिम पुरुषों पर आदिवासी महिलाओं को बहलाकर उनसे शादी करने का आरोप लगाया जाता है। मिंज इन दावों को पूरी गंभीरता से खारिज करती हैं और इन्हें सामाजिक तनाव बढ़ाने वाले मिथक मानती हैं।
ऐसे अपराधों के पीछे केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि भूमि विवाद, जाति गुटबाजी और आर्थिक विषमता जैसी गहराई से जुड़े सामाजिक कारक हैं। इन मुद्दों का सही समझ और पुनः समाज में जागरूकता ही समाधान की दिशा में पहला कदम है।
यह कहानी झारखंड के आदिवासी समाज की लड़ाई, उनकी जमीनी हकीकत और सामाजिक बदलाव की जरूरत को उजागर करती है, जहाँ न केवल अपराधों की जांच हो बल्कि समाज के सोचने के तरीकों में भी परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।
झारखंड में ‘डायन’ हत्या के मामलों का उच्चतम आंकड़ा बताता है कि यह सामाजिक समस्या कितनी गंभीर है। ये वारदातें प्रायः उन समुदायों में होती हैं जहां आदिवासी और निचली जातियों के लोग रहते हैं। इनके सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाना बेहद महत्वपूर्ण है।
देखा जाए तो ‘डायन’ मामलों के पीछे एक जटिल सामाजिक तंत्र काम करता है, जिसमें भूमि के स्वामित्व, बेरोजगारी, धार्मिक अंधविश्वास और महिला हनन सभी जुड़े हुए हैं। साथ ही, ‘लव जिहाद’ का मिथक भी इन परिस्थितियों में बढ़ती असुरक्षा और शंकाओं को और भड़काता है, जो कि एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ भड़काने का माध्यम बनता है।
नोलिना मिंज के अनुसार, इन अफवाहों को फैलाने वाले दावे समाज में विभाजन को बढ़ावा देते हैं और आदिवासी महिलाओं के अधिकारों को नुकसान पहुंचाते हैं। यह जरूरी है कि प्रशासन और समाज मिलकर महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सशक्त कदम उठाएं।
झारखंड की यह समस्या हमें याद दिलाती है कि सामाजिक जागरूकता, शिक्षा और न्यायिक प्रक्रिया ऐसे कार्य हैं जिनसे हमारी जड़ें मजबूत हो सकती हैं और हम अंधविश्वासों तथा अन्यायपूर्ण परंपराओं का खात्मा कर सकते हैं। केवल तब ही हम एक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण कर पाएंगे।
इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए सरकारी नीतियों को सुदृढ़ बनाना, स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना और सतत् शिक्षा कार्यक्रम चलाना आवश्यक है, ताकि भय और ग़लतफ़हमियों की जगह समझदारी और सहिष्णुता ले सके।
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