अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर नए प्रतिबंध लगाने की योजना के कुछ प्रावधानों को फिलहाल रोक दिया है। इस कदम से भारत को राहत मिल सकती है, क्योंकि अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी आयात शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा था। हालांकि, इस फैसले को लेकर अमेरिका में राजनीतिक विरोध बढ़ने की संभावना है।
अमेरिकी कांग्रेस ने रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध के लिए आर्थिक रूप से कमजोर करने के उद्देश्य से एक कानून को मंजूरी दी थी। इसके तहत ट्रंप को रूस से तेल खरीदने वाले पांच बड़े देशों के सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया था। इसके अलावा, रूसी ऊर्जा उत्पादों पर 500 फीसदी तक शुल्क लगाने का प्रावधान भी शामिल था।
इस कानून को लागू करने की समयसीमा 18 अक्टूबर थी। लेकिन ट्रंप ने शुक्रवार रात एक कार्यकारी आदेश जारी करके कुछ प्रतिबंधों को रोक दिया। उनका कहना था कि यह फैसला अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है।
इस कदम से भारत, चीन और तुर्की जैसे देशों के साथ व्यापारिक टकराव का खतरा भी कम हो सकता है।
भारत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी 51 फीसदी से अधिक थी।
दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी और भारत की हिस्सेदारी लगभग 37 फीसदी बताई गई।
ऐसे में अगर अमेरिका भारत से आने वाले सामान पर 100 फीसदी टैरिफ लगा देता, तो भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में कारोबार करना काफी महंगा हो जाता। खासकर उस समय जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते तेल की आपूर्ति में भी बाधाएं बनी हुई हैं, भारत के लिए रूसी तेल पर निर्भरता तेजी से घटाना आसान नहीं होता।
अमेरिकी कानून को मंजूरी मिलने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर अपनी चिंता जताई थी। मंत्रालय ने कहा था कि ऐसे कदमों का असर केवल भारत-अमेरिका संबंधों पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
द हिंदू की डिप्लोमैटिक अफेयर्स एडिटर सुहासिनी हैदर ने ट्रंप के फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत ने साफ कर दिया था कि वह अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में रूस से तेल खरीदना बंद नहीं करेगा। उनके मुताबिक, अपनी स्थिति स्पष्ट रखना और उस पर कायम रहना भारत के लिए फायदेमंद रहा।
ट्रंप के इस रुख से अमेरिका में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के कुछ सांसद नाराज हैं। सांसदों के एक समूह ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर नए प्रतिबंध कानून को लागू करने की मांग की थी।
इस कानून का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है। इसका मकसद रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन के खिलाफ चल रहे युद्ध को लेकर मॉस्को को आर्थिक नुकसान पहुंचाना है।
कानून में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, सरकारी अधिकारियों, बैंकों और उन तेल टैंकरों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है, जिनका इस्तेमाल मौजूदा प्रतिबंधों से बचने के लिए किया जाता है।
सीनेट की बैंकिंग समिति की वरिष्ठ डेमोक्रेटिक सदस्य एलिजाबेथ वॉरेन ने आरोप लगाया कि प्रतिबंधों में छूट देकर ट्रंप कांग्रेस की मंशा के खिलाफ काम कर रहे हैं। उनके मुताबिक, इससे रूस को युद्ध जारी रखने में मदद मिल सकती है।
ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका ऊर्जा की कीमतें कम रखने के लिए रूस से डीजल आयात कर सकता है। यह बयान ऐसे समय आया, जब अमेरिका में नवंबर में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं।
ट्रंप के इस रुख की यूक्रेन और अमेरिका के कुछ सहयोगी देशों ने आलोचना की है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस के साथ ऐसे समझौते को पुतिन के लिए फायदा बताया और कहा कि इससे युद्ध को बढ़ावा मिल सकता है।
इसी बीच, अमेरिका और यूक्रेन के रिश्तों में भी तनाव देखने को मिल रहा है। रूस लगातार यूक्रेन के नागरिक और ऊर्जा ढांचे को निशाना बना रहा है। दूसरी ओर, ट्रंप ने जेलेंस्की पर रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमले रोकने के लिए दबाव डाला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपने निर्यात के लिए नए बाजार तलाशने चाहिए, ताकि किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता न रहे। यूरोप और दूसरे क्षेत्रों के साथ मुक्त व्यापार समझौते भारतीय कंपनियों को नए अवसर दे सकते हैं।
हालांकि, केवल टैरिफ में छूट मिलने से दूसरे देशों में कारोबार बढ़ाना संभव नहीं होगा। भारतीय कंपनियों को बेहतर लॉजिस्टिक्स, अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों, नए डिजाइन और मजबूत वितरण नेटवर्क पर भी काम करना पड़ेगा।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अमेरिका पर निर्भरता कम करके अगर भारत किसी दूसरे एक बाजार पर बहुत ज्यादा निर्भर हो जाता है, तो जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होगा। इसलिए अलग-अलग देशों में ग्राहकों और कारोबार का आधार बढ़ाना जरूरी है।
कुल मिलाकर, ट्रंप के फैसले से भारत को फिलहाल राहत मिलने की उम्मीद है। लेकिन रूस से तेल खरीदने, अमेरिका के साथ व्यापार और यूक्रेन युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तनाव अभी बना हुआ है।

