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जब गांधी और अन्य भारतीय विचारकों ने नस्लीय समस्या से निपटने के लिए विश्व से हाथ मिलाया

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Jul 11, 2026 #source
When Gandhi and other Indian thinkers joined the world to take on the race problem

विश्व नस्लीय समस्या पर एकजुट हुए गांधी और अन्य भारतीय विचारक

1911 में यूनिवर्सल रेस कॉन्ग्रेस: नस्लों के बीच मेल और सहयोग की आशा

जुलाई 1911 में लंदन विश्वविद्यालय में 50 देशों और 22 सरकारों के 2,000 से अधिक प्रतिनिधि एकत्रित हुए, जहां एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन का नाम था यूनिवर्सल रेस कॉन्ग्रेस, जिसका उद्देश्य था पश्चिमी और पूर्वी देशों के लोगों के बीच, विशेष रूप से ‘सफेद’ और ‘रंगिन’ जातियों के मध्य, विज्ञान और आधुनिक चेतना के प्रकाश में संबंधों की विवेचना करना। यह सम्मेलन समझदारी, दोस्ती और सहयोग को बढ़ावा देने की आशा रखता था।

सम्मेलन में भाग लेने वालों के लिए यह आयोजन सतर्क आशावाद का प्रतीक था। भारतीय पत्रकार एस. निहाल सिंह ने अमेरिकन रिव्यू ऑफ रिव्यूज़ में लिखा कि प्रतिनिधि विश्वास करते थे कि राष्ट्रों के बीच शांति और नस्लों में एकता निरंतर सहयोग और आगामी सम्मेलनों के माध्यम से संभव होगी। हालांकि, यह विश्वास मात्र तीन वर्षों के भीतर प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका में टूट गया।

यूनिवर्सल रेस कॉन्ग्रेस किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। यह पिछले दो दशकों से बढ़ती वैश्विक चिंता का उत्कर्ष था, जो ‘नस्लीय सवाल’ पर केन्द्रित थी। जब साम्राज्य विस्तार कर रहे थे और स्वतंत्रता आंदोलनों को बल मिल रहा था, तब विश्व के कई लोग इन साम्राज्यों द्वारा उत्पन्न असमानताओं को दूर करने के उपाय खोज रहे थे। यह सम्मेलन उसी खोज की अभिव्यक्ति था।

एक साहसी दृष्टिकोण

इस आंदोलन की अत्यंत आवश्यकता को भले ही कुछ लोगों ने ही परिभाषित किया हो, पर इसकी गूंज विश्व भर के विचारकों और कार्यकर्ताओं के बीच सुनाई दी। विशेष रूप से महात्मा गांधी जैसे भारतीय विचारकों ने नस्लीय असमानता के खिलाफ आवाज उठाते हुए विश्व के सामने यह संदेश रखा कि मानवता की एकता ही स्थायी शांति की नींव है। गांधी और उनके समकालीन विचारकों ने सम्मेलन में भाग लेकर, विश्व नस्ल समस्या पर सहयोग और न्याय की आवश्यकता को बल दिया।

उतिहासिक परिप्रेक्ष्य से देखें तो यूनिवर्सल रेस कॉन्ग्रेस ने सामाजिक न्याय, समानता और मानवाधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रखा। हालांकि तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां इसे पूरी तरह सफल नहीं होने दीं, परंतु इस सम्मेलन ने नस्लीय मुद्दों पर वैश्विक संवाद की नींव रखी, जिसने भविष्य के आंदोलनों को प्रेरित किया।

आज के समय में भी उस सम्मेलन के विचार और संदेश प्रासंगिक हैं, जो हमें नस्लीय समानता, भाईचारे और बहुसांस्कृतिक सहयोग की ओर मार्गदर्शन करते हैं। यही विरासत गांधी और अन्य भारतीय विचारकों ने विश्व को दी।

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Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)