दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की बहस अब तक पराली, उद्योग और वाहनों के एग्जॉस्ट तक सीमित रही है। लेकिन इसी संकट के भीतर एक ऐसा प्रदूषण स्रोत लगातार बढ़ता जा रहा है, जो न तो धुएं के रूप में दिखता है और न ही पारंपरिक उत्सर्जन मानकों में पूरी तरह दर्ज होता है। यह है वाहनों के टायरों और ब्रेक का घर्षण, जिसे वैज्ञानिक भाषा में नॉन-एग्जॉस्ट एमिशन कहा जाता है। करीब 2,500 वर्ग किलोमीटर में फैले दिल्ली, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद, गाजियाबाद, इंदिरापुरम, वसुंधरा, वैशाली और कौशांबी के इस एकीकृत शहरी क्षेत्र में करोड़ों वाहनों की आवाजाही के साथ यह प्रदूषण अब हवा, सड़क की धूल मानव शरीर तीनों में गहराई से प्रवेश कर रहा है।
जब कोई वाहन सड़क पर चलता है, ब्रेक लगाता है, मोड़ काटता है या ट्रैफिक जाम में रुक-रुक कर आगे बढ़ता है, तो उसके टायरों की सतह धीरे-धीरे घिसती है। यह घिसाव बेहद सूक्ष्म कणों के रूप में बाहर निकलता है, जो हवा में उड़ जाते हैं या सड़क की धूल में मिल जाते हैं। इसी प्रक्रिया में ब्रेक पैड से भी महीन कण निकलते हैं। ये कण पीएम 10, पीएम 2.5, माइक्रोप्लास्टिक, सिंथेटिक रबर और जिंक जैसी भारी धातुओं से बने होते हैं। चूंकि यह प्रदूषण एग्जॉस्ट पाइप से नहीं निकलता, इसलिए लंबे समय तक इसे नीतिगत निगरानी से बाहर रखा गया।
एनसीआर में अनुमानित 1.6 से 1.8 करोड़ पंजीकृत वाहन हैं और प्रति वर्ग किलोमीटर औसतन 6400 से 7200 वाहन मौजूद हैं। इतनी अधिक वाहन घनत्व वाली जगहों पर टायर और ब्रेक घिसाव का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। सीपीसीबी, आईआईटी कानपुर और आईआईटी दिल्ली से जुड़े अध्ययनों के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर जैसे ट्रैफिक- घनत्व वाले क्षेत्र में सड़क परिवहन से जुड़े कुल प्रदूषण का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा नॉन-एग्जॉस्ट स्रोतों से आ सकता है। सर्दियों में जब हवा की गति कम होती है तो यह प्रदूषण लंबे समय तक वातावरण में फंसा रहता है।
आंकड़ों से समझें कितना फैलता है प्रदूषण
यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के आधार पर भारत-केंद्रित आकलन बताते हैं कि एक औसत कार हर साल अपने टायरों से 1 से 1.5 किलोग्राम तक सूक्ष्म कण छोड़ सकती है। दिल्ली-एनसीआर में अनुमानित 1.6 से 1.8 करोड़ कुल वाहनों के आधार पर यह आंकड़ा बेहद बड़ा बन जाता है। सतर्क और न्यूनतम गणना के अनुसार, यदि सभी प्रकार के वाहनों का औसत 1 किलोग्राम प्रति वाहन प्रति वर्ष भी माना जाए तो इस पूरे क्षेत्र में टायर घर्षण से हर साल करीब 16000 से 18000 टन सूक्ष्म कण उत्पन्न होते हैं।
यदि ऊपरी अनुमान यानी 1.5 किलोग्राम प्रति वाहन को आधार बनाया जाए, तो यह मात्रा 24000 से 27000 टन प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है।मासिक आधार पर देखें तो दिल्ली-एनसीआर में केवल टायर घिसाव से हर महीने औसतन 1300 से 2250 टन माइक्रो-पार्टिकुलेट मैटर वातावरण और सड़क की धूल में जुड़ रहा है। यह प्रदूषण किसी एक स्थान पर नहीं रुकता, बल्कि ट्रैफिक के साथ पूरे शहरी क्षेत्र में फैलता रहता है।कभी सीधे हवा में सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करता है, तो कभी सड़क पर जमकर वाहनों की आवाजाही से दोबारा उड़ जाता है।

