नोएडा में पिछले कई वर्षों से एक ऐसी “यूनिवर्सिटी” का मामला सामने आ रहा है, जो कागज़ों और वेबसाइट पर तो मौजूद है, लेकिन हकीकत में उसका कोई अता-पता नहीं है। महामाया तकनीकी विश्वविद्यालय के नाम पर डाक विभाग में रोज़ाना भारी संख्या में चिट्ठियां पहुंचती हैं, लेकिन कर्मचारियों को हर बार लौटना पड़ता है, क्योंकि शहर में इस नाम का कोई संस्थान मौजूद ही नहीं है। एडमिशन, जॉब और अन्य जरूरी दस्तावेजों से जुड़े ये पत्र अंततः वापस भेजने पड़ते हैं। हैरानी की बात यह है कि इसके कथित संचालकों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा सकी है।
बीते महीने यूजीसी ने जिन 22 फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी की थी, उनमें उत्तर प्रदेश के चार संस्थान शामिल हैं—और नोएडा का यह महामाया तकनीकी विश्वविद्यालय भी उसी में एक है। सूची सामने आते ही राज्य सरकार ने उच्च शिक्षा निदेशालय से विस्तृत जांच रिपोर्ट मांगी। क्षेत्रीय अधिकारियों ने पहली रिपोर्ट भेज तो दी, लेकिन उसमें कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टता नहीं थी, जिसके बाद दोबारा जांच के आदेश जारी किए गए हैं। शासन ने यह भी पूछा है कि यह फर्जी विश्वविद्यालय अभी भी सक्रिय है या नहीं, यहां किन-किन पाठ्यक्रमों की डिग्री दी जाती है और अब तक क्या कार्रवाई हुई है।
पिछले सप्ताह शासन की एक विशेष जांच टीम नोएडा पहुंची और सबसे पहले दिए गए पते की पड़ताल की। टीम में शामिल सहायक निदेशक डॉ. बी.एल. शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय का पता पूरी तरह गलत निकला। टीम ने कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई भी व्यक्ति या कार्यालय वहां मौजूद नहीं मिला। इसके बाद जांचकर्ताओं ने डाक विभाग से जानकारी जुटाई, जहां कर्मचारियों ने बताया कि इस नाम पर लगातार पत्र आते हैं, लेकिन फर्जी पते के कारण उन्हें हर बार लौटाना पड़ता है। यूजीसी की सूची में भी संस्थान का सही पता नहीं दिया गया है, जिसके चलते आशंका गहराती जा रही है कि यह विश्वविद्यालय केवल एक वेबसाइट तक ही सीमित है और इसका जमीनी अस्तित्व नहीं है।
जांच अधिकारियों का कहना है कि 30 नवंबर तक पूरे मामले की रिपोर्ट शासन को भेज दी जाएगी। इस घटना ने एक बार फिर फर्जी शैक्षणिक संस्थानों के नेटवर्क और छात्रों को होने वाले संभावित नुकसान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।