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रामचंद्र गुहा: स्वतंत्र भारत को आकार देने वाले सात द्वैताधिकार और जो सबसे अधिक हानिकारक रहे

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May 17, 2026 #duopolies, #source
Ramachandra Guha: Seven duopolies that shaped independent India (and which have been most damaging)

स्वतंत्र भारत के सात द्वैताधिकार: रामचंद्र गुहा का विश्लेषण

6 अगस्त 2019 को, मैं बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान में कुछ सहकर्मियों के साथ कॉफ़ी पी रहा था। हम कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर चर्चा कर रहे थे, जो पिछले दिन हुआ था। इस बीच, एक युवा कंप्यूटर वैज्ञानिक ने कहा, “अब हमारे पास मोदी 2.0 नहीं, बल्कि शाह 1.0 है।” यह कथन उस गृह मंत्री अमित शाह की ओर इशारा था, जिसने देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य की स्थिति को कमजोर करने की योजना बनाई और उसे सफल बनाया।

शायद इसे ‘शाह 1.0’ कहना अतिशयोक्ति हो, पर अब यह स्पष्ट था कि अमित शाह केवल सरकार में दूसरे सबसे अधिक शक्तिशाली व्यक्ति नहीं थे, बल्कि नरेंद्र मोदी के बाद एकमात्र ऐसे मंत्री थे जिनके पास वास्तविक अधिकार और स्वतंत्र कार्रवाई की क्षमता थी।

मोदी-शाह की जोड़ी की तुलना स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में जवाहरलाल नेहरू और वल्लभभाई पटेल के सहयोग से की जा सकती है। आज के विषैले राजनीतिक विवादों में उन्हें प्रतिस्पर्धी बताया जाता है, पर असल में वे मित्र, सहकर्मी और कार्यकर्ता थे। विभाजन के विनाश के बीच, कमी, संघर्ष और कलह के दौर में, एक एकीकृत और लोकतांत्रिक भारत की स्थापना नेहरू और पटेल की साझेदारी के बिना संभव नहीं हो पाती।

रामचंद्र गुहा ने इस राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य के भीतर स्वतंत्र भारत को आकार देने वाले सात ऐसे द्वैताधिकारों (duopolies) की पहचान की है, जिन्होंने देश के विकास एवं प्रगति पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने यह भी बताया कि इनमें से कौन-कौन से द्वैताधिकार सबसे अधिक हानिकारक साबित हुए हैं, जिनका प्रभाव आज भी महसूस किया जाता है।

स्वतंत्र भारत ने शुरुआत में कई द्वैताधिकार देखे, जिनमें राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रभावों की विभिन्न परतें थीं। ये द्वैताधिकार न केवल सत्ता के दो केंद्रीकृत स्रोत होते हैं, बल्कि वे नीतिगत निर्णयों और शासन प्रक्रिया में गहन भूमिका निभाते हैं। उदाहरणस्वरूप नेहरू-पटेल, मोदी-शाह आदि जोड़ी ने देश की दिशा निर्धारित की।

इन द्वैताधिकारों का आकलन करते हुए गुहा ने कहा कि वे समस्या नहीं थे, बल्कि वे सही संयोजन में बेहतर निर्णय और सामंजस्य भी ला सकते थे। परंतु कुछ वक्त के बाद निहित स्वार्थ, सत्ता की अतिकेंद्रिता और पारदर्शिता की कमी ने कई द्वैताधिकारों को देश के लिए विषाणु स्वरूप बना दिया। यह स्थिति स्वायत्त संस्थानों और समावेशी लोकतंत्र के लिए खतरा उत्पन्न करती है।

इस प्रकार, गुहा के विश्लेषण में स्वतंत्र भारत के रूपांतरण में इन सात द्वैताधिकारों की भूमिका जटिल और विषम रही है। वे बतलाते हैं कि विकास और प्रगति के लिए इन द्वैताधिकारों की रचना और कार्यप्रणाली में आवश्यक सुधार महत्वपूर्ण है, ताकि लोकतंत्र की मजबूती और जनता की भलाई सुनिश्चित की जा सके।

यह व्यापक चिंतन न केवल इतिहास और राजनीति के छात्र, बल्कि नीति निर्माता और आम नागरिक के लिए भी जरूरी है, जिससे वे समझ सकें कि देश को कितना संतुलित, समावेशी और उत्तरदायी नेतृत्व की आवश्यकता है।

यह कहानी हमारे लोकतंत्र की जटिलताओं और राजनीतिक यथार्थता का एक महत्वपूर्ण प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है, जो भविष्य के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।

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Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)