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वेस्टर्न रेलवे का विंड-सोलर हाइब्रिड पायलट प्रोजेक्ट हुआ बंद, बिजली उत्पादन और लागत के मामले में नहीं रहा कारगर

वेस्टर्न रेलवे ने मुंबई के सबअर्बन रेलवे नेटवर्क पर हवा और सौर ऊर्जा के जरिए बिजली उत्पादन के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था। हालांकि, बिजली उत्पादन और लागत-प्रभावशीलता के मामले में यह प्रोजेक्ट पारंपरिक सोलर सिस्टम के मुकाबले उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका। इसके बाद पायलट प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया।

बांद्रा-खार और नाइगांव-वसई सेक्शन में लगाया गया था सिस्टम

बांद्रा-खार और नाइगांव-वसई सेक्शन में लगाए गए विंड-सोलर हाइब्रिड सिस्टम ने 10 मई 2023 से 15 जनवरी 2025 के बीच कुल 8,793 kWh बिजली पैदा की। मूल्यांकन में सामने आया कि इसका बिजली उत्पादन रिपोर्ट में बताए गए सोलर मानकों की तुलना में 49.44% कम था। वहीं, इसकी इंस्टॉलेशन लागत पारंपरिक सोलर सिस्टम के मुकाबले करीब 4.86 गुना ज्यादा थी।

इस प्रोजेक्ट को कुल ₹19.47 लाख की लागत से शुरू किया गया था। नासिक की M/s रिसर्च सेंटर फॉर सस्टेनेबल सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड को इसके लिए एजेंसी नियुक्त किया गया था। दोनों स्थानों पर विंड-सोलर हाइब्रिड सिस्टम लगाए गए थे और प्रत्येक की पीक क्षमता 4 kW थी। इनमें 2 kW पीक सोलर क्षमता और 2 kW पीक विंड क्षमता शामिल थी। इस तरह दोनों सिस्टम की कुल इंस्टॉल्ड क्षमता 8 kW पीक थी।

उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया प्रोजेक्ट

यह सिस्टम 10 मई 2023 को शुरू किया गया था। प्रदर्शन के आकलन के दौरान दोनों प्लांट्स ने कुल 8,793 kWh बिजली उत्पन्न की। यह प्रति kWp 1,099 kWh के बराबर था। बिजली उत्पादन 1.78 kWh प्रति kWp प्रति घंटा दर्ज किया गया, जबकि कैपेसिटी यूटिलाइजेशन फैक्टर (CUF) 7.42% रहा।

इसके मुकाबले रिपोर्ट में बताया गया कि एक पारंपरिक सोलर सिस्टम औसतन 3.6 kWh बिजली प्रति kWp प्रति घंटा पैदा करता है और उसका CUF 15% रहता है।

हाइब्रिड सिस्टम में दो नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को एक साथ इस्तेमाल करने के बावजूद अपेक्षित फायदे हासिल नहीं हुए। इसके अलावा, लागत भी एक बड़ी चुनौती रही। रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक सोलर पावर प्रोजेक्ट की लागत लगभग ₹50,000 प्रति किलोवाट-पीक (kWp) थी, जबकि विंड-सोलर हाइब्रिड सिस्टम की लागत ₹2.43 लाख प्रति kWp आंकी गई। ज्यादा निवेश के बावजूद हाइब्रिड सिस्टम से बिजली उत्पादन काफी कम रहा।

बैटरी स्टोरेज की भी थी जरूरत

नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन में होने वाले उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए इस प्रोजेक्ट में बैटरी स्टोरेज की व्यवस्था भी जरूरी थी। सोलर पैनल और विंड टर्बाइन के जरिए 24V बैटरी बैंक को चार्ज किया जाता था। इसके बाद इन्वर्टर जमा DC पावर को लाइट और पंखे जैसे उपकरणों के लिए 230V AC सप्लाई में बदलता था।

जब नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन कम होता था, तब बैटरी से बिजली की आपूर्ति की जाती थी। बैटरी डिस्चार्ज होने के बाद सिस्टम ग्रिड पावर पर चला जाता था। बैटरी को पूरी तरह डिस्चार्ज होने से बचाने के लिए AC चार्जर का इस्तेमाल भी किया जाता था।

मूल्यांकन में बैटरी सिस्टम के कारण बढ़ने वाले अतिरिक्त रखरखाव के बोझ को भी रेखांकित किया गया। गाइडलाइंस के तहत बैटरी की नियमित निगरानी और जरूरत पड़ने पर उन्हें बदलने की बात कही गई थी।

कम बिजली उत्पादन और ज्यादा लागत बनी वजह

मूल्यांकन के बाद निष्कर्ष निकला कि कम बिजली उत्पादन, अधिक शुरुआती लागत और बैटरी से जुड़ी रखरखाव की जरूरतों के कारण यह सिस्टम पारंपरिक सोलर पावर की तुलना में कोई खास लाभ नहीं दे सका। इसी वजह से अंततः पायलट प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया।

इस निष्कर्ष का असर इस बात पर भी पड़ सकता है कि रेलवे अपने सबअर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भविष्य में रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स का मूल्यांकन किस तरह करता है, खासकर उन स्थानों पर जहां इंस्टॉलेशन लागत और लंबे समय तक रखरखाव महत्वपूर्ण पहलू हैं।

By admin

Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)