अरुणाचल प्रदेश: पूर्वोत्तर का विकास मॉडल और रणनीतिक महत्व
नई दिल्ली/इटानगर। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने शुक्रवार को पूर्वोत्तर क्षेत्र के पिछले दस वर्षों में आए उल्लेखनीय परिवर्तनों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एक समय उग्रवाद और अल्पविकास की छाया में रहने वाला यह क्षेत्र अब भारत की विकास गाथा में एक अहम भूमिका निभा रहा है।
मुख्यमंत्री खांडू ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्वोत्तर को विकास एजेंडा का केंद्र बनाए जाने से इस क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव हुआ है। नीतिगत सतत प्रयास और बुनियादी ढांचे के विस्तार ने सामाजिक-आर्थिक रूप से पूर्वोत्तर की पहचान ही बदल दी है।
उन्होंने केंद्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों की नियमित यात्राओं को विकास की गति तेज करने में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। इन यात्राओं से स्थानीय स्तर पर समस्याओं की पहचान और समाधान सुनिश्चित करने में सुविधा मिली है।
नई दिल्ली में आयोजित आइजैक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी (आईसीपीपी) ग्रोथ कॉन्फ्रेंस 2026 को संबोधित करते हुए खांडू ने अरुणाचल प्रदेश को भारत के सबसे खूबसूरत और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में गिना। पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा, सबसे पूर्वी और सबसे उत्तरी राज्य होने के साथ यह क्षेत्रीय अस्मिता का केंद्र भी है।
मुख्यमंत्री ने राज्य के विकास का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि 1972 में उत्तर पूर्वी सीमांत एजेंसी (एनईएफए) से केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद 1987 में अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। साथ ही राज्य की सांस्कृतिक विविधता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यहाँ 26 प्रमुख जनजातियां और सौ से अधिक उप-जनजातियां मौजूद हैं। हिंदी भाषा संपर्क की एक मूलभूत कड़ी के रूप में सामाजिक एकता स्थापित करती है।
अंत में, जलविद्युत उत्पादन के क्षेत्र में अरुणाचल प्रदेश की क्षमताओं को रेखांकित करते हुए मुख्यमंत्री ने इसे ‘भारत का पावरहाउस’ बताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में लगभग 19,000 मेगावाट की जलविद्युत परियोजनाएं विभिन्न विकास चरणों में हैं और 2047 तक क्षमता को 40,000 मेगावाट तक बढ़ाने की योजना है, जो देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगी।