बेल नियम जेल अपवाद: सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामलों में जमानत के सिद्धांत को फिर से स्थापित किया
नई दिल्ली। उमर खालिद केस: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में उमर खालिद को जमानत न देने के अपने पिछले निर्णय की समीक्षा के दौरान महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत केवल सामान्य मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि कठोर कानून UAPA पर भी इसका समान रूप से पालन होना आवश्यक है।
बड़ी बेंच के फैसलों का अधिकारिक प्रभाव
अदालत ने बड़ी बेंच और छोटी बेंच के बीच संबंध पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छोटी बेंच कभी भी बड़ी बेंच के निर्णय को कमजोर या निरस्त नहीं कर सकती। यदि किसी मामले में असहमति हो, तो इसे संबंधित मुख्य न्यायाधीश के सामने बड़ी बेंच के गठन के लिए प्रस्तुत किया जाना चाहिए। बड़े बेंच के फैसले निचली और समान पद की सभी बेंचों के लिए बाध्यकारी होते हैं।
मुकदमे की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2021 में नजीब केस में दिए गए निर्देश आज भी लागू और प्रभावी हैं। इस आदेश के अनुसार, ट्रायल लंबित होने पर आरोपी को जमानत मिलना चाहिए, भले ही वह UAPA के तहत बरी या दोषी माना गया हो। यह सिद्धांत नारको-टेररिज्म के आरोप में पिछले पांच वर्षों से जेल में बंद सैयद इफ्तिखार अंद्राबी के मामले में भी लागू किया गया।
UAPA में भी लागू होगा जमानत का बुनियादी सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि UAPA की धारा 43D(5) का दुरुपयोग कर किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं होगा। “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत आतंकवाद और गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में भी समान रूप से लागू है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि केवल आरोपों के आधार पर जमानत से निरंतर इनकार किया जाना हिरासत को सजा का रूप दे सकता है, जो कि संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है।
लंबी हिरासत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब ट्रायल वर्षों तक लंबित रहता है और आरोपी समान अवधि तक जेल में बंद रहता है, तब व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और निजी स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसे UAPA जैसे सख्त कानूनों के साथ भी संतुलित करना आवश्यक है।
अन्य महत्वपूर्ण फैसले और NCRB के आंकड़ों पर विचार
अदालत ने नार्को-टेरर से जुड़े एक अन्य केस में भी ऐसी ही टिप्पणी की, जहां आरोपी पांच वर्षों से हिरासत में था। न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून के प्रावधानों के मध्य संतुलन बनाए रखने पर बल दिया। जस्टिस उज्जल भुइयां ने NCRB के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2019 से 2023 के दौरान UAPA मामलों में दोषसिद्धि दर मात्र 1.5% से 4% के बीच रही, जबकि कई वर्षों में इससे भी कम रही। जम्मू-कश्मीर में 2019 में दोषसिद्धि दर शून्य और 2022 में 0.89% ही थी।
अधिकांश आरोपी बरी होते हैं
कोर्ट ने यह भी कहा कि UAPA मामलों में 94% से 98% आरोपी अंततः बरी हो जाते हैं, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह आंकड़ा करीब 99% है। इतने कम दोषसिद्धि दर के बावजूद लंबे समय तक हिरासत में रखना गंभीर न्यायिक सवाल खड़ा करता है।
विचाराधीन हिरासत को सजा में नहीं बदलना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर चेतावनी दी कि यदि अदालतें केवल प्रारंभिक आरोपों के आधार पर जमानत से इनकार करती रहीं, तो विचाराधीन कैद सजा का रूप ले जाएगी। न्यायिक प्रणाली सुनिश्चित करे कि जांच और ट्रायल में देरी के कारण भी किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो।
संवैधानिक अधिकार और न्यायिक संतुलन आवश्यक
सुप्रीम कोर्ट ने अंत में दोहराया कि देश के न्याय तंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा कानूनों के बीच संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। हर मामले में संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक सिद्धांतों को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए, चाहे आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों।
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न बेंचों के बीच मतभेद
दिल्ली दंगों के मामले में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने 2021 के तीन जजों की बेंच के फैसले का अनुपालन नहीं किया था। केंद्र सरकार बनाम के ए नजीब केस में सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमों में देरी को भी जमानत का आधार माना था। मगर जनवरी 2024 में जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने उमर खालिद और शरजील इमाम को लंबी हिरासत के कारण जमानत से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि नजीब केस का आदेश केवल असाधारण मामलों में लागू होता है।
“त्वरित सुनवाई का अधिकार खत्म नहीं किया जा सकता”
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी का त्वरित सुनवाई का संवैधानिक अधिकार केवल इसलिए समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि उस पर कठोर UAPA लगाया गया है। अदालत ने कहा कि मुकदमा लंबित रहने की स्थिति में भी आरोपी के मौलिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।