‘‘चपल रानी’’ : बंगाल की अंतिम रानी और एक अनूठी जीवनी
कोलकाता में कई लोगों ने चपल भादुड़ी के बारे में सबसे पहले नवीन किशोर के दस्तावेज़ी फिल्म परफॉर्मिंग द गॉडेस: द चपल भादुड़ी स्टोरी (1999) के माध्यम से जाना। किशोर कई भूमिकाएँ निभाते हैं, जिनमें से आज सबसे प्रसिद्ध उनके सीगल बुक्स के प्रकाशक के रूप में हैं। यही कारण है कि उन्होंने संदीप रॉय को एक पुस्तक लिखने का सुझाव दिया, जो जात्रा कलाकार और समलैंगिक अभिनेता चपल भादुड़ी के जीवन और समयों को समर्पित हो। परिणामस्वरूप हमारे पास है चपल रानी, द लास्ट क्वीन ऑफ बंगाल: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ अ फीमेल इम्परसोनेटर।
यह कहना गलत होगा कि यह पुस्तक केवल चपल रानी के बारे में है। रॉय ने इस जीवनी में भादुड़ी के असाधारण जीवन के कई पहलुओं को उजागर किया है—एक ऐसे लड़के की कहानी जो एक प्रसिद्ध नाट्य परिवार से था और जात्रा में महिला की भूमिका निभा कर मशहूरी पाई, बाद में उसे मंच छोड़ना पड़ा। वे संभवतः भारत के पहले खुले तौर पर समलैंगिक अभिनेता थे, जिन्होंने मां सीताला की भूमिका निभाकर अनेक भक्तों का दिल जीता और बाद के जीवन में समलैंगिक सामाजिक प्रतीक बन गए। रॉय ने भादुड़ी के जीवन की विरोधाभास, जटिलताएं, उतार-चढ़ाव बड़े निपुणता से प्रस्तुत किए हैं।
चपल का जन्म 1939 में हुआ था, मूलतः नाम भवेश या चपलेश था और वे कई भाई-बहनों में से एक थे। कुछ वर्षों बाद एक बहन का जन्म हुआ…
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