उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के राजनीतिक दायरे में अचानक अलग तरह की हलचल दिखने लगी है। बिहार में विधानमंडल दल का नेता चुने जाने के लिए उन्हें पार्टी का पर्यवेक्षक बनाए जाने की खबर ने UP की राजनीति में उनकी अहमियत और बढ़ा दी है। आठ साल से लगातार डिप्टी सीएम रहने वाले मौर्य केंद्र की कई प्रभावशाली हस्तियों से करीबी संपर्क में रहते हैं। कुछ महीने पहले लखनऊ के एक कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह ने उन्हें “मित्र” कहकर संबोधित किया था, जिसने उनके राजनीतिक कद को और मजबूती दी।
आज जिस तरह भाजपा का चरित्र ब्राह्मण–बनिया पार्टी की छवि से निकलकर OBC-सेंट्रिक होती जा रही है, ऐसे में यह मानने में कोई झिझक नहीं कि मौर्य की भूमिका बड़े स्तर पर बदलने वाली है। सवाल सिर्फ इतना है—क्या उनकी नई पारी यूपी में ही शुरू होगी या उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलने वाली है?
क्यों बढ़ रही है मौर्य के प्रमोशन की संभावना?
केशव प्रसाद मौर्य लंबे समय से भाजपा के प्रमुख OBC चेहरे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में वह यूपी भाजपा के अध्यक्ष थे, हालांकि CM का पद योगी आदित्यनाथ को मिला। लेकिन 2022 में सरकार दोबारा बनने के बावजूद भाजपा की सीटें कम हो गईं। 2024 के लोकसभा चुनाव में तो पार्टी 34 सीटों पर सिमट गई। इसका बड़ा कारण OBC वोट का खिसकना माना गया। इसलिए 2027 को ध्यान में रखकर भाजपा को मौर्य जैसे नेताओं को केंद्रीय भूमिका देनी ही होगी।
बिहार में मौर्य की भूमिका ने बढ़ाया कद
भाजपा के लिए बिहार का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण था। सह-प्रभारी के तौर पर मौर्य ने OBC–EBC वोटों को एकजुट कर NDA की जीत में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने मुजफ्फरपुर, दरभंगा सहित कई जिलों में 50 से अधिक रैलियां कीं। उनकी जाति—कुर्मी—बिहार के गैर-यादव OBC वोटर्स को भाजपा की ओर खींचने में अहम कारक बनी।
18 नवंबर 2025 को भाजपा संसदीय बोर्ड ने उन्हें बिहार विधायक दल का नेता चुनने के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया, जिसमें उन्होंने पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्वक निपटाकर अपनी संगठनात्मक क्षमता भी साबित की।
भाजपा अध्यक्ष पद की दौड़ में भी नाम आगे
पार्टी में अध्यक्ष की नियुक्ति पहले से लंबित है और इस रेस में केशव प्रसाद मौर्य का नाम तेजी से उभर रहा है। OBC बैकग्राउंड, अमित शाह से निकटता और बिहार चुनावों में सफलता उन्हें इस पद का मजबूत दावेदार बनाते हैं। साथ ही योगी आदित्यनाथ से उनके संबंधों में समय-समय पर दिखी खटास भी उन्हें राष्ट्रीय भूमिका के लिए उपयुक्त विकल्प बनाती है।
2017 में हार के बाद भी डिप्टी सीएम—क्या संकेत देता है?
सिराथू सीट से 7,000 वोटों से हारने के बावजूद मौर्य को डिप्टी सीएम पद पर बनाए रखना इस बात का स्पष्ट संकेत था कि शीर्ष नेतृत्व का भरोसा उन पर कायम है। 2022 में जब दिनेश शर्मा की जगह ब्रजेश पाठक को डिप्टी सीएम बनाया गया, तब भी मौर्य की कुर्सी सुरक्षित रही।
दिल्ली दौरे और RSS कनेक्शन भी बढ़ाते हैं महत्व
दिल्ली में मौर्य की गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकातें अक्सर सुर्खियों में रहती हैं, और हर बार लौटकर वे और भी सक्रिय नज़र आते हैं। साथ ही, RSS और VHP से उनका पुराना संबंध और राम मंदिर आंदोलन में उनकी भागीदारी उन्हें ‘काडर-आधारित नेता’ की श्रेणी में मजबूत जगह देती है।
कुल मिलाकर, केशव प्रसाद मौर्य की राजनीतिक तरक्की में अब कोई बड़ी बाधा दिखाई नहीं देती। बस सही समय और सही अवसर का इंतजार है—और वह क्षण शायद अब बहुत दूर नहीं।

