Report By: ICN Network
मुंबई में गणेशोत्सव का जिक्र हो और गणेश गल्ली के बप्पा यानी ‘मुंबईचा राजा’ का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। लालबाग के राजा से कुछ ही दूरी पर विराजमान यह गणेश प्रतिमा अपनी भव्यता और अलग पहचान के लिए जानी जाती है। करीब 48 साल से यहां 22 फीट ऊंचे गणपति विराज रहे हैं, जो सिर्फ एक मूर्ति नहीं, बल्कि कला, आस्था और समर्पण की जीवंत कहानी हैं।
इस परंपरा की शुरुआत मूर्तिकार दीनानाथ वेलिंग ने की थी। 1977 में उन्होंने मिट्टी से देश की सबसे ऊंची गणेश प्रतिमा गढ़ी थी। वेलिंग मास्टर का यह साहसिक प्रयास न केवल गणेश गल्ली, बल्कि पूरे महाराष्ट्र के लिए प्रेरणा बन गया। आज भारत में जहां-जहां विशाल गणेश प्रतिमाएं दिखाई देती हैं, वहां उनकी कला की छाप महसूस की जा सकती है।
1928 में लोकमान्य तिलक द्वारा सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा शुरू होने के बाद, लालबाग क्षेत्र के युवाओं ने भी गणेश गल्ली में स्थापना की थी। समय के साथ आयोजकों ने ठाना कि वे ऐसी प्रतिमा बनाएंगे जो कला और श्रद्धा का अद्भुत संगम हो। उनकी यह तलाश वेलिंग मास्टर पर जाकर खत्म हुई, जिन्होंने छोटी मूर्तियां बनाने से शुरुआत कर 22 फीट की अद्वितीय प्रतिमा का सपना साकार किया।
वेलिंग की बनाई मूर्ति में भव्यता के साथ-साथ गणपति के चेहरे पर वही शांति और सौम्यता झलकती थी, जो भक्तों को दिव्यता का अनुभव कराती थी। तभी से गणेश गल्ली की प्रतिमा की ऊंचाई 22 फीट ही रखी जाती है और यह परंपरा आज तक कायम है।
वेलिंग और गणेश गल्ली मंडल का रिश्ता केवल कलाकार और आयोजकों का नहीं रहा। जब 1989 में वेलिंग गंभीर रूप से बीमार पड़े, तब मंडल ने उनकी पूरी देखभाल की और इलाज का खर्च भी उठाया। इसी वर्ष उन्होंने अपनी आखिरी मूर्ति बनाई। बाद में उनके शिष्य विजय खातू ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
आज ‘मुंबईचा राजा’ सिर्फ गणेश प्रतिमा नहीं, बल्कि एक कलाकार के जुनून, मंडल की निष्ठा और भक्तों की आस्था का प्रतीक है। यहां हर साल गूंजने वाला नारा “22 फीट वाले की जय” उसी महान परंपरा को सलाम है।