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सरच्चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लघु कथा: अपर्णा के जाने के बाद पूजा कौन करेगा

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May 29, 2026 #source
Short fiction by Saratchandra Chattopadhyay: Who will conduct the prayers after Aparna leaves?

मिट्टी के खेल: नदी किनारे के कुम्भों का जीवन

गांव के नदी किनारे दो कुम्भकार परिवार सदियों से मिट्टी के खिलौने बनाकर अपना जीवन निर्वाह करते आए हैं। ये परिवार मिट्टी लेकर उसे साँचे में डालकर गुड़िया बनाते और बाजार में बेचते हैं। उनके इस काम ने न केवल उनकी आजीविका सुनिश्चित की बल्कि पारंपरिक शिल्प का संरक्षण भी किया।

महिलाएँ अपनी अलग-अलग जिम्मेदारियाँ पूरी करती हैं; जल लाना, रसोई बनाना तथा अपने परिवार के सदस्यों का पोषण करना। उनका काम यहाँ खत्म नहीं होता, वे आग के करीब से इन पकी हुई मिट्टी की आकृतियों को सावधानी से निकालती हैं, उन्हें अपने साड़ियों के कोनों से साफ कर पुरुषों को रंगने के लिए देती हैं।

शक्तिनाथ, जो एक बीमार ब्राह्मण बालक है, कुम्भों के इस परिवेश में खुद को पूरी तरह समर्पित कर चुका है। उसने अपने दोस्तों, खेलों और पढ़ाई को त्याग कर मिट्टी की इन गुड़ियाओं से लगाव बना लिया है। वह बांस के उपकरण साफ करता है, साँचे से मिट्टी हटाता है और यह देखकर व्यथित होता है कि गुड़ियाओं पर रंग असावधानी से भरा जाता है।

उन गुड़ियाओं की भौंहें, आँखें और होंठ स्याही से बनाए जाते हैं, जहां कोई गुड़िया मोटी भौंहों वाली होती हैं तो कहीं केवल आधी भौंह होती है, और कुछ गुड़ियाओं के होठों के नीचे स्याही के दाग भी हो जाते हैं।

शक्तिनाथ ने कहा, “सरकार दादा, आप इतने अनियमित क्यों रंग डाल रहे हैं?”

सरकार दादा ने जवाब दिया, “बामुनठाकुर, अगर मैं सावधानी से रंग डालूंगा तो ज्यादा शुल्क देना पड़ेगा।”

यह संवाद इस पारंपरिक शिल्प की जटिलताओं और उससे जुड़ी आर्थिक वास्तविकताओं की ओर संकेत करता है। गाँव के कुम्भकार परिवारों की कहानी, उनकी परिश्रम और सामाजिक परिस्थितियों की एक जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करती है।

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Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)