जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ अनुराग सागर ने बताया कि ओपीडी में सांस संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पहले फिजिशियन ओपीडी में रोजाना करीब 800 मरीज आते थे, जो अब बढ़कर लगभग 1,000 तक पहुंच गए हैं। इनमें से 250 से 300 मरीज सांस लेने में दिक्कत, खांसी और गले के संक्रमण की शिकायत लेकर आ रहे हैं।
यथार्थ अस्पताल के डॉ. अरुणाचलम एम ने बताया कि वर्तमान में हवा की गुणवत्ता इतनी खराब है कि पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति भी लंबे समय तक बाहर रहने पर खांसी, सांस लेने में परेशानी, गले में खराश या आंखों में जलन जैसी समस्याएं महसूस कर सकता हैा। लगातार ऐसी हवा में रहने से फेफड़ों की बीमारियां बढ़ सकती हैं। प्रदूषण सिर्फ फेफड़ों को नहीं, बल्कि शरीर के कई हिस्सों को प्रभावित करता है। यह खांसी, दमा, हार्ट अटैक, सिरदर्द और थकान जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है। बच्चों और गर्भवती पर इसका असर और भी गंभीर होता है। हृदय और डायबिटीज मरीजों के लिए प्रदूषण बेहद खतरनाक
मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के डॉ सुजीत नारायण ने बताया कि प्रदूषण के कारण ओपीडी में हृदय रोगियों की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। प्रदूषण हृदय और डायबिटीज के मरीजों के लिए एक अदृश्य लेकिन अत्यंत खतरनाक ट्रिगर बन चुका है। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक पीएम 2.5, पीएम 10 और ओजोन जैसे सूक्ष्म कणों के संपर्क में रहने से हार्ट फेल्योर, स्ट्रोक और अचानक कार्डियक अरेस्ट का जोखिम बढ़ जाता है। ये कण फेफड़ों से रक्त में प्रवेश कर सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और एंडोथीलियल डिसफंक्शन को बढ़ाते हैं, जिससे धमनियों में एथेरोस्क्लेरोसिस की प्रक्रिया तेज हो जाती है। सिर्फ फेफड़े नहीं, पूरे शरीर को है नुकसान
मेदांता अस्पताल के डॉ. मनु मदान ने बताया कि प्रदूषण बढ़ने के बाद ओपीडी और आपातकालीन विभाग में आने वाले मरीजों की संख्या में 30 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। प्रभाव केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित करता है। पीएम 2.5 और पीएम 0.1 जैसे सूक्ष्म कण रक्त प्रवाह में प्रवेश कर हृदय विफलता, उच्च रक्तचाप और हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा देते हैं।

