विभूति भूषण बंधोपाध्याय के ‘पथेर पांचালি’ के सौ वर्ष: साहित्य और सिनेमा का अमर संगम
1925 में जब विभूति भूषण बंधोपाध्याय खेलत घोष के पठूरिआघाटा राजबाड़ी में कार्यरत थे, उसी दौरान उन्होंने अपने प्रथम उपन्यास पथेर पांचाली की रूपरेखा तैयार की। ये उपन्यास बाद में बांग्ला साहित्य में एक मील का पत्थर साबित हुआ और विश्व साहित्य एवं सिनेमा में अपनी अमिट छाप छोड़ गया।
बन्धोपाध्याय के कुछ कहानी संग्रह उस समय लोकप्रिय बांग्ला पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे, किन्तु पथेर पांचाली ने उन्हें साहित्यिक पहचान दी। यह उपन्यास 1928 में बिचित्र नामक पत्रिका में क्रमशः प्रकाशित हुआ और 1929 में रंजन प्रकाशनालय द्वारा संपूर्ण संस्करण स्वरूप जारी किया गया।
1955 में प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे ने इसी उपन्यास पर आधारित अपनी पहली फिल्म बनाई, जिससे इसके साहित्यिक महत्व को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नवजीवन मिला। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में सामाजिक यथार्थ की प्रधानता स्थापित की है।
2026 में पथेर पांचाली की रचना के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। लेखक के पोते त्रिनंकुर बनर्जी, जो स्वयं एक कलाकार हैं, ने पिछले वर्ष लेखक के कार्य से प्रेरित कुछ वस्तुएं प्रदर्शित कीं, जो बेहद लोकप्रिय रहीं। यह प्रेरणा और विरासत वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए साहित्य और कला में निरंतर संदर्भ बनेगी।
पथेर पांचाली केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि बंगाली ग्रामीण जीवन का एक जीवंत दस्तावेज है, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तनों को सूक्ष्म दृष्टि से दर्शाता है। विभूति भूषण की सहज भाषा और सूक्ष्म भावों ने इसे कालजयी साहित्य का दर्जा दिलाया।