भाजपा का बंगाल में ओबीसी आरक्षण पुनःगठन: एक व्यापक समीक्षा
पश्चिम बंगाल में नई भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने सोमवार को घोषणा की कि राज्य की अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) की सूची को खत्म कर दिया जाएगा और शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण को 17% से घटाकर मात्र 7% किया जाएगा। इस फैसले को कोलकाता उच्च न्यायालय के मई 2024 के एक आदेश के अनुरूप बताया गया, जैसा कि मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया।
यह कदम राज्य की ओबीसी सूची को 2010 की स्थिति में पुनः स्थापित करता है, जिससे 76 जाति समूहों की ओबीसी मान्यता समाप्त हो जाएगी। इस निर्णय से सबसे अधिक प्रभावित वर्ग बंगाली मुसलमान हैं, जिनके लिए यह एक बड़ा झटका है।
सरकार की यह घोषणा ट्रिनमूल कांग्रेस के 15 वर्षों के शासनकाल में जारी लगभग 48 लाख ओबीसी प्रमाणपत्रों की पुनः जांच के प्रस्ताव के कुछ दिनों बाद आई है। दोनों निर्णय मिलकर बंगाल में पिछले वर्षों से अस्तित्व में रह रहे ओबीसी आरक्षण ढांचे को समाप्त करने की दिशा में है।
भाजपा की ये पहल लंबे समय से जारी उसकी उस आलोचना का हिस्सा है जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर ओबीसी आरक्षण नीति के माध्यम से मुसलमानों का राजनीतिक आधार मजबूत करने का आरोप लगाया गया है, जबकि वास्तविक पिछड़ी जातियों के उत्थान को नजरअंदाज किया गया।
हालांकि, बंगाली मुस्लिम समुदाय के विद्वान इस बदलाव को लेकर चिंतित हैं क्योंकि उनका मानना है कि इससे उनकी हाल ही में हासिल हुई थोड़ी सामाजिक और आर्थिक उन्नति बाधित होगी।
ओबीसी राजनीति का संक्षिप्त इतिहास
ओबीसी राजनीति का इतिहास जटिल रहा है, जिसमें सामाजिक न्याय की मांगें और राजनैतिक जरूरतें समय-समय पर बदलती रही हैं। बंगाल में ओबीसी आरक्षण की स्थापना और उसका क्रमिक विस्तार पिछले कुछ दशकों में महत्वपूर्ण राजनीतिक कारणों से प्रभावित रहा है। वर्तमान परिवर्तन इस परिप्रेक्ष्य में नए राजनीतिक समीकरणों का परिणाम माना जा सकता है।