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एसआईआर के बाद बंपर वोटिंग का रुझान, क्या टूट रहे हैं सियासत के पुराने मिथक?

एसआईआर के बाद बंपर वोटिंग का ट्रेंड, क्या टूट रहे सियासत के पुराने मिथक?

एसआईआर के बाद बंपर वोटिंग ने चुनी हुई राजनीति के पुराने मिथकों को चुनौती दी

नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र में विधानसभा चुनावों का महत्व हमेशा से रहा है, पर 2026 के चुनावों में हुई बंपर वोटिंग ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। चुनाव आयोग द्वारा किए गए ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (एसआईआर) के बाद पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में रिकॉर्ड मतदाता सहभागिता देखी गई है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को पुरानी मान्यताओं पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर दिया है।

एसआईआर ने मतदाता सूचियों से मृत, डुप्लीकेट, और अस्थायी मतदाताओं के नाम हटाकर चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया है। इससे न केवल चुनावी फर्जीवाड़े पर रोक लगी, बल्कि असली मतदाताओं की भागीदारी भी बढ़ी। 2026 के विधानसभा चुनाव अब लोकतंत्र की एक टेस्टिंग लैब बन चुके हैं, जहाँ मतदान प्रतिशत ने नए रिकॉर्ड बनाए हैं।

पश्चिम बंगाल के पहले चरण में 92 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ, जबकि तमिलनाडु में यह आंकड़ा 85.15 प्रतिशत तक पहुंचा, जो राज्य के इतिहास में सर्वाधिक है। महिलाओं की मतदान दर पुरूषों से अधिक रही, जिससे स्पष्ट होता है कि महिला मतदाता अब राजनीतिक फैसलों में एक निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की महिला उन्मुख योजनाओं ने इस बदलाव को बढ़ावा दिया है।

चुनाव आयोग के एसआईआर अभियान के तहत हजारों फर्जी मतदाताओं के नाम हटाए गए। उदाहरणस्वरूप, पश्चिम बंगाल से 91 लाख और तमिलनाडु से 57 लाख नाम हटाये जाने से मतदान प्रतिशत में गणितीय उछाल आया। साथ ही, प्रवासी और अन्य मतदाताओं में यह भय भी जागा कि मतदान न करने पर उनका नाम काटा जा सकता है, जिससे वोटिंग प्रतिशत बढ़ा।

राजनीतिक पंडित वरिष्ठ पत्रकार सुवाशीष मैत्रा के अनुसार, हाल के चुनावी परिणामों ने यह संकेत दिया है कि भारी वोटिंग का मतलब हर बार सत्ता विरोधी लहर नहीं होता। महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों ने बंपर वोटिंग के बावजूद सत्तारूढ़ सरकारों को मजबूत बहुमत देते हुए इस सोच को परिवर्तित कर दिया है। यह नए चुनावी युग की शुरुआत है जहाँ भारी मतदान ‘प्रो-इनकंबेंसी’ यानी सत्ता के समर्थन का भी परिचायक बन सकता है।

यदि परंपरागत राजनीतिक सिद्धांतों को लागू करें, तो पश्चिम बंगाल में बढ़ा हुआ मतदान ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ असंतोष को और भाजपा को लाभ पहुंचाने वाला माना जाता। तमिलनाडु में भी बढ़ती वोटिंग को डीएमके सरकार के विरुद्ध माना जा सकता है। हालांकि, जैसा कि हरियाणा और महाराष्ट्र में देखा गया, भारी वोटिंग कभी-कभी सत्ता समर्थन की ताकत भी बन जाती है।

अतः यह कहना उचित होगा कि 2026 के विधानसभा चुनावों में एसआईआर के बाद की बंपर वोटिंग ने राजनीति के पुराने मिथकों को चुनौती दी है। महिला मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी और मतदान डेटा की शुद्धता ने भारतीय लोकतंत्र की परिकल्पना को नयी दिशा दी है, जिससे भविष्य के चुनाव और उनके परिणाम अधिक व्यापक और जटिल संदर्भों में समझे जाने की आवश्यकता है।

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By admin

Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)