कलगोठ के इस विद्यालय में चार स्वीकृत शिक्षक पद हैं, लेकिन सभी रिक्त पड़े हैं। वर्तमान में केवल एक अतिथि शिक्षक हिंदी पढ़ा रहा है, जबकि गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और अंग्रेजी जैसे महत्वपूर्ण विषयों के लिए कोई शिक्षक नहीं है। नतीजतन, उच्च माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो चुकी है। हालात इतने बदतर हैं कि बच्चे, जो इस उम्र में किताबों में डूबे होने चाहिए, शिक्षकों की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। यह दृश्य न केवल शिक्षा व्यवस्था की विफलता को उजागर करता है, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाता है। ग्रामीणों में उबाल, आंदोलन की चेतावनी ग्राम प्रधान सहदेव सिंह और विद्यालय अभिभावक संघ की अध्यक्ष दमयंती देवी ने बताया कि पिछले एक साल से वे ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) कार्यालय से लेकर जिला शिक्षा अधिकारी और उच्च शिक्षा मंत्री तक गुहार लगा चुके हैं। लेकिन हर बार केवल खोखले आश्वासनों का पिटारा खुलता है। जिन शिक्षकों को अटैच किया गया, उन्हें गांव में किसी ने देखा तक नहीं। इससे ग्रामीणों में आक्रोश का लावा फूट रहा है। ग्राम प्रधान ने चेतावनी दी, “यदि शीघ्र शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई, तो ग्रामीण और अभिभावक शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। एक अतिथि शिक्षक के भरोसे बच्चों का भविष्य कैसे संवरेगा? सरकारी दावों की हकीकत बीईओ जोशीमठ पंकज कुमार उप्रेती ने दावा किया कि रिक्त पदों को भरने के लिए निदेशालय स्तर पर पत्राचार किया गया है और वैकल्पिक व्यवस्था के तहत आसपास के स्कूलों से दो शिक्षकों को अटैच करने के आदेश दिए गए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को झुठलाती है। कलगोठ जैसे सीमांत गांवों में शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं आज भी एक सपना बनी हुई हैं। उत्तराखंड माइग्रेशन प्रिवेंशन कमीशन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, चमोली, पिथौरागढ़ और पौड़ी जैसे जिलों में 3,504 स्कूलों में केवल एक शिक्षक तैनात है, और 1,149 प्राइमरी स्कूलों में कोई शिक्षक ही नहीं है। शिक्षा व्यवस्था पर सवाल कलगोठ के बच्चों की यह पुकार सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा संकट का प्रतीक है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और सपने होने चाहिए, वे आज शिक्षकों की कमी के खिलाफ नारेबाजी करने को मजबूर हैं। यह स्थिति सरकार की उदासीनता और नीतिगत विफलताओं को उजागर करती है। माइग्रेशन प्रिवेंशन कमीशन के उपाध्यक्ष डॉ. एस.एस. नेगी ने पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा सुधारों की तत्काल जरूरत पर जोर देते हुए शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अलग ट्रांसफर नीति और रेजिडेंसी नियमों में छूट की वकालत की है आगे की राह कलगोठ के इस संकट ने न केवल स्थानीय समुदाय को आंदोलन के लिए प्रेरित किया है, बल्कि पूरे उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली पर बहस छेड़ दी है। सरकार ने हाल ही में 15 सहायक शिक्षकों को नियुक्ति पत्र सौंपे और दावा किया कि चार साल में 25,000 शिक्षकों की भर्ती की गई है। लेकिन जब तक ये नियुक्तियां सुदूर गांवों तक नहीं पहुंचतीं, तब तक कलगोठ जैसे स्कूलों में बच्चों की आवाज अनसुनी रहेगी। क्या सरकार इन मासूमों की पुकार सुनेगी, या यह संकट और गहराएगा? यह सवाल उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था और सरकार की प्राथमिकताओं को कठघरे में खड़ा करता है।
उत्तराखंड शिक्षा संकट: चमोली के कलगोठ में शिक्षकों की कमी, किताबों की उम्र में बच्चों की नारेबाजी, सरकार की उदासीनता पर सवाल
उत्तराखंड शिक्षा संकट कलगोठ के इस विद्यालय में चार स्वीकृत शिक्षक पद हैं, लेकिन सभी रिक्त पड़े हैं। वर्तमान में केवल एक अतिथि शिक्षक हिंदी पढ़ा रहा है, जबकि गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और अंग्रेजी जैसे महत्वपूर्ण विषयों के लिए कोई शिक्षक नहीं है। नतीजतन, उच्च माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो चुकी है। हालात इतने बदतर हैं कि बच्चे, जो इस उम्र में किताबों में डूबे होने चाहिए, शिक्षकों की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। यह दृश्य न केवल शिक्षा व्यवस्था की विफलता को उजागर करता है, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाता है। ग्रामीणों में उबाल, आंदोलन की चेतावनी ग्राम प्रधान सहदेव सिंह और विद्यालय अभिभावक संघ की अध्यक्ष दमयंती देवी ने बताया कि पिछले एक साल से वे ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (बीईओ) कार्यालय से लेकर जिला शिक्षा अधिकारी और उच्च शिक्षा मंत्री तक गुहार लगा चुके हैं। लेकिन हर बार केवल खोखले आश्वासनों का पिटारा खुलता है। जिन शिक्षकों को अटैच किया गया, उन्हें गांव में किसी ने देखा तक नहीं। इससे ग्रामीणों में आक्रोश का लावा फूट रहा है। ग्राम प्रधान ने चेतावनी दी, “यदि शीघ्र शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई, तो ग्रामीण और अभिभावक शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे। एक अतिथि शिक्षक के भरोसे बच्चों का भविष्य कैसे संवरेगा? सरकारी दावों की हकीकत बीईओ जोशीमठ पंकज कुमार उप्रेती ने दावा किया कि रिक्त पदों को भरने के लिए निदेशालय स्तर पर पत्राचार किया गया है और वैकल्पिक व्यवस्था के तहत आसपास के स्कूलों से दो शिक्षकों को अटैच करने के आदेश दिए गए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को झुठलाती है। कलगोठ जैसे सीमांत गांवों में शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं आज भी एक सपना बनी हुई हैं। उत्तराखंड माइग्रेशन प्रिवेंशन कमीशन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, चमोली, पिथौरागढ़ और पौड़ी जैसे जिलों में 3,504 स्कूलों में केवल एक शिक्षक तैनात है, और 1,149 प्राइमरी स्कूलों में कोई शिक्षक ही नहीं है। शिक्षा व्यवस्था पर सवाल कलगोठ के बच्चों की यह पुकार सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा संकट का प्रतीक है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और सपने होने चाहिए, वे आज शिक्षकों की कमी के खिलाफ नारेबाजी करने को मजबूर हैं। यह स्थिति सरकार की उदासीनता और नीतिगत विफलताओं को उजागर करती है। माइग्रेशन प्रिवेंशन कमीशन के उपाध्यक्ष डॉ. एस.एस. नेगी ने पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा सुधारों की तत्काल जरूरत पर जोर देते हुए शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अलग ट्रांसफर नीति और रेजिडेंसी नियमों में छूट की वकालत की है आगे की राह कलगोठ के इस संकट ने न केवल स्थानीय समुदाय को आंदोलन के लिए प्रेरित किया है, बल्कि पूरे उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था की बदहाली पर बहस छेड़ दी है। सरकार ने हाल ही में 15 सहायक शिक्षकों को नियुक्ति पत्र सौंपे और दावा किया कि चार साल में 25,000 शिक्षकों की भर्ती की गई है। लेकिन जब तक ये नियुक्तियां सुदूर गांवों तक नहीं पहुंचतीं, तब तक कलगोठ जैसे स्कूलों में बच्चों की आवाज अनसुनी रहेगी। क्या सरकार इन मासूमों की पुकार सुनेगी, या यह संकट और गहराएगा? यह सवाल उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था और सरकार की प्राथमिकताओं को कठघरे में खड़ा करता है।

