यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के आधार पर भारत-केंद्रित आकलन बताते हैं कि एक औसत कार हर साल अपने टायरों से 1 से 1.5 किलोग्राम तक सूक्ष्म कण छोड़ सकती है। दिल्ली-एनसीआर में अनुमानित 1.6 से 1.8 करोड़ कुल वाहनों के आधार पर यह आंकड़ा बेहद बड़ा बन जाता है। सतर्क और न्यूनतम गणना के अनुसार, यदि सभी प्रकार के वाहनों का औसत 1 किलोग्राम प्रति वाहन प्रति वर्ष भी माना जाए तो इस पूरे क्षेत्र में टायर घर्षण से हर साल करीब 16000 से 18000 टन सूक्ष्म कण उत्पन्न होते हैं। यदि ऊपरी अनुमान यानी 1.5 किलोग्राम प्रति वाहन को आधार बनाया जाए, तो यह मात्रा 24000 से 27000 टन प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है।मासिक आधार पर देखें तो दिल्ली-एनसीआर में केवल टायर घिसाव से हर महीने औसतन 1300 से 2250 टन माइक्रो-पार्टिकुलेट मैटर वातावरण और सड़क की धूल में जुड़ रहा है। यह प्रदूषण किसी एक स्थान पर नहीं रुकता, बल्कि ट्रैफिक के साथ पूरे शहरी क्षेत्र में फैलता रहता है।कभी सीधे हवा में सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करता है, तो कभी सड़क पर जमकर वाहनों की आवाजाही से दोबारा उड़ जाता है।
दिल्ली: ब्रेक और टायर के घर्षण से 27000 टन अनदेखा वायु प्रदूषण
यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के आधार पर भारत-केंद्रित आकलन बताते हैं कि एक औसत कार हर साल अपने टायरों से 1 से 1.5 किलोग्राम तक सूक्ष्म कण छोड़ सकती है। दिल्ली-एनसीआर में अनुमानित 1.6 से 1.8 करोड़ कुल वाहनों के आधार पर यह आंकड़ा बेहद बड़ा बन जाता है। सतर्क और न्यूनतम गणना के अनुसार, यदि सभी प्रकार के वाहनों का औसत 1 किलोग्राम प्रति वाहन प्रति वर्ष भी माना जाए तो इस पूरे क्षेत्र में टायर घर्षण से हर साल करीब 16000 से 18000 टन सूक्ष्म कण उत्पन्न होते हैं। यदि ऊपरी अनुमान यानी 1.5 किलोग्राम प्रति वाहन को आधार बनाया जाए, तो यह मात्रा 24000 से 27000 टन प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है।मासिक आधार पर देखें तो दिल्ली-एनसीआर में केवल टायर घिसाव से हर महीने औसतन 1300 से 2250 टन माइक्रो-पार्टिकुलेट मैटर वातावरण और सड़क की धूल में जुड़ रहा है। यह प्रदूषण किसी एक स्थान पर नहीं रुकता, बल्कि ट्रैफिक के साथ पूरे शहरी क्षेत्र में फैलता रहता है।कभी सीधे हवा में सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करता है, तो कभी सड़क पर जमकर वाहनों की आवाजाही से दोबारा उड़ जाता है।

