1886 में मलका जान को दाघ देहलवी द्वारा लिखा गया पत्र उनकी मास्नवी ‘ना’ला ए मलका’ (मलका की वेदना) की महत्ता को दर्शाता है। दाघ ने लिखा, “आपके समुदाय की पहचान स्याही है और आपका सिद्धांत आज़ादी। आपकी प्रतिभा अद्भुत है और आपकी रचना आपके भाग्य की तरह भव्य है। आपकी मास्नवी अपने रूप में अनूठी है – फितरत से भरी, अंग्रेज़ी में सोची गई और हिन्दुस्तानी में अभिव्यक्त।”
दाघ के शब्द मलका जान की उस दौर की साहित्यिक महिला के रूप में प्रसिद्धि का प्रमाण हैं, लेकिन यह रचना आज खो चुकी है। यह एकमात्र रचना नहीं है जो समय के साथ लुप्त हो गई। 19वीं सदी में कई महिलाएँ उर्दू कवियित्रियाँ के रूप में उभरीं, जिनमें अधिकतर तवायफ़ थीं, परन्तु उनके नायाब कलाम को पुरुष समकक्षों की तरह संरक्षित नहीं किया गया।
उत्तर भारत के लेखन के क्षेत्र पर ग़ालिब, ज़ौक़ और दाघ जैसे पुरुष कवियों का प्रभुत्व रहा, जिसके कारण महिलाओं की आवाज़ धीरे-धीरे दबती गई। साथ ही, महिला कवयित्रियों पर अक्सर आरोप लगे कि उनके शेर पुरुष प्रशंसकों द्वारा छिपकर लिखवाए गए हैं।
इन प्रतिभाशाली महिलाओं द्वारा बुने गए शब्दों के छिटपुट प्रमाण तज़कीराओं में ही बचे हैं, जो इन कवयित्रियों का चरित्र और कुछ कविताएँ प्रकाशित करती हैं।
मलका जान की पहली कविता संकलन, ‘मखज़ाना ए उल्फ़त ए मलका’, 1886 में प्रकाशित हुई थी, जो उनकी शायरी के संग्रह का महत्वपूर्ण साक्ष्य है।