उत्तर प्रदेश के पुलिस इतिहास में डीएसपी जियाउल हक हत्याकांड एक ऐसा काला अध्याय है, जिसने न केवल खाकी को झकझोर दिया, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी बड़ा सियासी तूफान खड़ा कर दिया था. 2 मार्च 2013 को प्रतापगढ़ के कुंडा इलाके में हुई यह वारदात आज भी न्याय व्यवस्था और पुलिस सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े करती है.
बलिपुर गांव और वो खूनी पंचायत
घटना की शुरुआत कुंडा के बलिपुर गांव में प्रधान नन्हे यादव की हत्या से हुई थी. मौके पर हालात को संभालने पहुंचे जांबाज डीएसपी जियाउल हक पर उग्र भीड़ ने हमला बोल दिया. अराजकता के बीच उन्हें बेरहमी से पीटा गया और फिर गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई. जांच में सामने आया कि उनके सिर पर गंभीर चोटें थीं, पसलियां टूटी हुई थीं और सीने में गोली के निशान थे. उनकी सर्विस रिवॉल्वर भी गायब कर दी गई थी.
साइकिल वाले ‘ईमानदार अफसर’ की सादगी
जियाउल हक अपनी सादगी और बेदाग ईमानदारी के लिए जाने जाते थे. वे अक्सर गरीबों की मदद करते और किसी निमंत्रण में जाने के लिए सरकारी गाड़ी के बजाय साइकिल का इस्तेमाल करना पसंद करते थे. उनकी शहादत ने पूरे प्रदेश को सन्न कर दिया और तत्कालीन सरकार को कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बैकफुट पर ला दिया