हिंदुत्व और संघीयता की जंग: टीएमसी एवं डीएमके के गिरते प्रभाव का विश्लेषण
भारतीय राजनीति में 1980 के दशक तक हिंदुत्व का सत्ता में आना लगभग असंभव प्रतीत होता था, क्योंकि उस दौर में धर्मनिरपेक्षता की गहरी जड़ें थीं। लेकिन बीते चार दशकों में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस विचारधारा को नियंत्रित कर स्वयं को मजबूत सत्ता धुरी के रूप में स्थापित किया है।
हाल के विधानसभा चुनाव परिणामों ने यह संकेत दिया है कि अब संघीयता के स्वर भी भाजपा के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी है, जो बंगाली राष्ट्रीयता का प्रतिनिधित्व करती है। जबकि तमिलनाडु में भाजपा की भूमिका सीमित रही, फिर भी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के त्यौहार पर भारी हार ने इस बात को चिन्ताजनक बना दिया है। डीएमके ने भारत में संघीयता और राज्य आधारित भाषाई पहचान को विशेष बल दिया है।
संघीयता: भाजपा की नई चुनौती
1990 और 2000 के दशक में धर्मनिरपेक्षता के कमजोर होने के बाद संघीयता भाजपा के लिए एक मुख्य चुनौती बनकर उभरी। इसका प्रमुख कारण चुनावी रणनीति भी था। मोदी सरकार के दौर में संघीय राज्यों की भूमिका और उनकी राजनैतिक स्वायत्तता भाजपा के लिए एक बड़ी चिंता का विषय रही है। भाजपा ने केंद्र में स्थिर सत्ता हासिल की, पर राज्य स्तर पर कई बार उसे अपनी पकड़ मजबूत करने में संघर्ष करना पड़ा।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की अस्थिरता और तमिलनाडु में डीएमके की बढ़ती हार, भाजपा के संघीयता पर प्रभाव को दर्शाती हैं। यह संकेत मिलते हैं कि भाजपा ने राज्य आधारित पहचानकर्ताओं को चुनौती देने का एक नया दौर शुरू किया है। ऐसे में भाजपा द्वारा प्रस्तुत एक राष्ट्रवादी भारतीयता की अवधारणा संघीयता के स्वरूपों के साथ संघर्ष कर रही है।
व्यापक राजनीतिक परंपराओं, भाषा और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर आकार लेने वाली संघीयता ने भारतीय लोकतंत्र को एक विविधता भरा ताना-बाना प्रदान किया है। इसके विरुद्ध राजनीतिक दलों की लड़ाई केवल सत्ता नियंत्रण की लड़ाई नहीं, बल्कि भारतीय पहचान के व्यापक स्वरूप की भी झांकी है।
इस संदर्भ में टीएमसी और डीएमके का चुनावी पतन केवल राजनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि संघीय भारत के राजनीतिक संतुलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ भी माना जा सकता है। संघीयता और राज्य विशिष्ट पहचान के रास्ते पर भाजपा द्वारा शुरू की गई चुनौती भारत के संघीय तंत्र के भविष्य को परिभाषित करेगी।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि को समझे बिना वर्तमान राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण अधूरा रहेगा। केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन एवं पहचान का संघर्ष भारतीय राजनीति के चरम पर पहुंच चुका है जिसे आने वाले दिनों में ही समझा जा सकेगा।
The India Fix द्वारा शोएब दानियाल में आपका स्वागत है। यह समाचारपत्र भारतीय राजनीति की समीक्षा प्रस्तुत करता है।यदि आपको यह समाचार पसंद आए और आप इसे हर सप्ताह अपनी मेलबॉक्स में प्राप्त करना चाहते हैं, तो कृपया यहाँ क्लिक कर ‘फॉलो’ करें।