धार्मिक बलि पर लगाम लगाने के प्रयास के खिलाफ CPI (एम-एल) ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन ने मंगलवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय में पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ याचिका दाखिल की है। इसका कारण है राज्य सरकार का 1950 के पशु हत्या नियंत्रण अधिनियम का इस्तेमाल कर पशु बलि पर कड़े प्रतिबंध लगाना।
सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 4 मई को सत्ता में आने के बाद इस कानून की कठोर रूप से पालना करने का निर्णय लिया। यह आदेश बकरीद से दो सप्ताह पहले, 27 मई को जारी किया गया, जो एक मुस्लिम त्यौहार है और बलिदान की भावना को समर्पित है। पारंपरिक रूप से इस दिन बकरियां काटी जाती हैं।
अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को भैंस, गाय और बैल जैसे पशुओं की हत्या से पहले प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य होगा। सार्वजनिक स्थल पर पशु हत्या प्रतिबंधित कर दी गई है और निरीक्षण करने वाले अधिकारियों के कार्य में बाधा पहुंचाने पर रोक लगाई गई है।
यह प्रमाण पत्र नगरपालिका के अध्यक्ष या सरपंच तथा सरकारी पशु चिकित्सक द्वारा जारी किया जाता है। इसमें यह सत्यापित किया जाना जरूरी है कि पशु हत्या के लिए उपयुक्त है। साथ ही यह भी पुष्टि की जानी चाहिए कि पशु 14 वर्ष से अधिक उम्र का हो और न तो काम के लिए उपयोगी हो, न प्रजनन के लिए।
सीपीआई (एम-एल) ने इस आदेश को धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताकर इसे चुनौती दी है और कहा कि इस कदम से धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वहीं सरकार का तर्क है कि यह कानून पशु कल्याण और अवैध बलि को रोकने के लिए आवश्यक है।
यह विवाद राज्य में पशु हत्या नियंत्रण के कानूनी और सामाजिक आयामों को लेकर गंभीर बहस को जन्म दे रहा है। उच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई चल रही है, जो भविष्य में इस विषय पर स्पष्ट दिशा निर्धारित करेगी।