भारत में डेटा सेंटरों की जल और ऊर्जा उपयोग को लेकर बढ़ती चिंताएं
आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिले में गूगल के नए डेटा सेंटर की स्थापना से तकनीकी क्षेत्र में बड़ा बदलाव आने वाला है, लेकिन इस विकास से जुड़े जल और ऊर्जा उपयोग को लेकर पर्यावरणीय सवाल भी उठ रहे हैं।
28 अप्रैल को विशाखापत्तनम के तार्लुवाडा गांव में गूगल का डेटा सेंटर शुरू करने के लिए भूमि शिलान्यास हुआ, जिसे कंपनी का अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा डेटा सेंटर माना जा रहा है। इस डेटा सेंटर को कंपनी ने पिछले अक्टूबर में घोषित किए गए एआई हब के हिस्से के रूप में विकसित किया है। राज्य सरकार ने विशाखापत्तनम और आनाकपल्ली जिलों में इस हब के लिए कुल 480 एकड़ भूमि आबंटित की है।
हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ता और वकीलों ने इस परियोजना के लिए आवश्यक जल और ऊर्जा की खपत को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मौजूदा अनुमोदन प्रक्रिया में डेटा सेंटर जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विशेष संसाधन आवश्यकताओं को उचित प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। वे पर्यावरण संरक्षण के लिए डेटा सेंटरों को एक अलग श्रेणी में रखकर सख्त पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं।
विशेषज्ञ भी एक स्पष्ट और ठोस राष्ट्रीय डेटा सेंटर नीति की आवश्यकता पर ज़ोर देते हैं। भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 2020 में एक मसौदा नीति जारी की थी, लेकिन तब से अब तक उस पर कोई अंतिम निर्णय या अद्यतन जारी नहीं हुआ है।
इसी बीच, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड भी विशाखापत्तनम में 1.5 गीगावाट क्षमता वाला एक बड़ा डेटा सेंटर क्लस्टर बनाने की योजना बना रहा है। आंध्र प्रदेश राज्य अगले कुछ वर्षों में कुल 6.5 गीगावाट कंप्यूटिंग क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखता है।
पर्यावरणीय चिंता
डेटा सेंटरों में मुख्य रूप से सिस्टम को ठंडा करने के लिए जल का उपयोग होता है। अकेले गूगल ही अपनी पूरी वैश्विक संचालन में लगभग 31 बिलियन लीटर पानी का उपयोग करता है। इससे स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने की आशंका है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पानी पहले से ही सीमित है।
ऊर्जा खपत भी एक बड़ा मुद्दा है, क्योंकि डेटा सेंटरों के संचालन में भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है। यदि यह बिजली पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से आती है, तो इससे कार्बन उत्सर्जन में भी वृद्धि हो सकती है। इससे जुड़ी पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए नवीनीकृत ऊर्जा और सतत विकास के उपायों को अपनाना जरूरी है।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए डेटा सेंटरों के निर्माण और संचालन के लिए सख्त नियम और पारदर्शी नीतियां बनाना आवश्यक है। यह न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम होगा बल्कि तकनीकी विकास को स्थायी बनाने में भी मदद करेगा।