भारत में दहेज हत्या: विवाह व्यवस्था की जटिलताओं पर एक विश्लेषण
हाल ही में भोपाल में 33 वर्षीय ट्विषा शर्मा की संदिग्ध मौत ने एक बार फिर देश में दहेज प्रथा से जुड़ी गंभीर चुनौतियों को उभारा है। यह मामला विवाह के भीतर बढ़ती हिंसा और दहेज की मांग को लेकर चल रही बहस को नए सिरे से जोर देता है।
ट्विषा शर्मा की शादी के मात्र छह महीने बाद 12 मई को उनकी मृत्यु घर पर पाई गई। मृतक के पति और ससुराल पक्ष का दावा है कि यह आत्महत्या थी, लेकिन उसके माता-पिता ने हत्या का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि ट्विषा को दहेज की मांगों और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। मामले में पति, कानून व्यवसायी समर्थ सिंह और उनकी माता, सेवानिवृत्त न्यायाधीश गिरिबाला सिंह को गिरफ्तार किया गया।
1970 और 1980 के दशक में उत्तर भारत में दहेज की मांग के कारण हुई दहेज हत्या की घटनाओं ने महिलाओं के खिलाफ गृहस्थ हिंसा को लेकर व्यापक सामाजिक आंदोलनों को उत्पन्न किया था। इस दौरान कुछ घटनाओं में नवनववाहित महिलाओं को केरोसिन छिड़ककर जलाकर मारने की वारदातें सामने आईं। इस प्रकार की हिंसा ने महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को तेज किया।
फिर भी, समय के साथ इस गंभीर समस्या के पीछे एक बड़ा सामाजिक विषय अनदेखा रह गया है: विवाह की संस्कृति और उसकी समाज में अनिवार्य भूमिका। नारीवादी विद्वान मैरी ई जॉन इसे ‘‘अनिवार्य विवाह’’ कहते हैं, जो लगभग सार्वभौमिक सामाजिक आवश्यकता बन गया है। विवाह को समाज में महिला के लिए सुरक्षा, सम्मान, स्थिरता और प्रजनन के लिए मात्र स्वीकृत स्थान माना जाता है।
यह न केवल दहेज जैसी कुप्रथाओं को जन्म देता है, बल्कि महिलाओं की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को भी बाधित करता है। वर्तमान स्थिति में यह आवश्यक है कि हम विवाह के इस दबाव और उससे उत्पन्न हिंसा पर गहन विचार करें और समग्र सामाजिक बदलाव की दिशा में काम करें।