हन्नान मोल्लाह का टीएमसी पर तीखा प्रहार: राजनीतिक हिंसा लोकतंत्र के लिए खतरा
नई दिल्ली। सीपीआई (एम) नेता हन्नान मोल्लाह ने हाल ही में टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले को लेकर गंभीर बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि टीएमसी के साथ जारी संकट के लिए वह खुद जिम्मेदार हैं, क्योंकि जैसा वे करते आए हैं, वैसा ही उनके साथ भी हो रहा है। हालांकि, हन्नान मोल्लाह ने इस तरह की हिंसा का समर्थन करने से साफ इनकार किया।
हन्नान मोल्लाह ने पश्चिम बंगाल में पिछले कई वर्षों में राजनीतिक हिंसा और दमन की लगातार बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विभिन्न दलों के कार्यकर्ताओं पर अत्याचार, कार्यालयों पर जबरदस्त कब्जे और राजनीतिक टकराव गहराने जैसी घटनाएं लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत हैं। उनके मुताबिक, राजनीतिक मतभेदों का समाधान लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि हिंसा के रास्ते।
सीपीआई (एम) नेता ने बताया कि बंगाल की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि वे आत्ममंथन करें और हिंसा से दूरी बनाएं ताकि लोकतंत्र मजबूत हो सके।
राहुल गांधी के हालिया बयानों और देश की परीक्षा प्रणाली पर उठाए गए सवालों पर हन्नान मोल्लाह ने कहा कि भारत में शिक्षा प्रणाली और परीक्षा व्यवस्था में अनेक कमियां हैं। वे पेपर लीक और अनियमितताओं की घटनाओं को गंभीर समस्या मानते हैं, जो समय-समय पर प्रकाश में आती रहती हैं।
महंगाई, डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को उन्होंने आम जनता के लिए बड़ा बोझ बताया। उनका मानना है कि आर्थिक समस्याओं का प्रत्यक्ष असर शिक्षा और सामाजिक ढांचे पर पड़ता है। यदि देश की व्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो शिक्षा प्रणाली पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
परीक्षा सुरक्षा और सीबीएसई से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने कहा कि किसी भी संस्था में यदि खामियां सामने आती हैं, तो उन्हें स्वीकार करना जरूरी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह समस्या केवल एक राज्य या सरकार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यापक स्तर पर देखी जा रही हैं।
रामचंद्र गुहा द्वारा राहुल गांधी पर की गई टिप्पणी के संदर्भ में हन्नान मोल्लाह ने बताया कि यह व्यक्तिगत राय है और विभिन्न लोग अलग-अलग नजरिए रख सकते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी नेता का असली मूल्यांकन जनता और समय ही करता है, न कि केवल किसी एक व्यक्ति की बात।
उन्होंने राजनीति में नेतृत्व की पहचान जनता के समर्थन से जोड़ी। उनका कहना था कि किसी भी नेता की स्वीकार्यता उसके समर्थकों की संख्या पर निर्भर करती है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं और अंत में जनता ही तय करती है कि किसे अपना समर्थन देना है।