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महारस्ट्र: आज ‘शहर की सरकार’ के लिए वोटिंग हो रही है. मुख्‍य रूप से दो धड़ों (महायुति और एमवीए) के बीच चुनावी मुकाबला

महाराष्‍ट्र में आज ‘शहर की सरकार’ के लिए वोटिंग हो रही है. मुख्‍य रूप से दो धड़ों (महायुति और एमवीए) के बीच चुनावी मुकाबला है. हालांकि, कई दल अपने गठजोड़ को छोड़कर दूसरे का हाथ थाम चुके हैं. हर नगर निगम में चुनावी गठजोड़ की तस्‍वीर अलग है. शिवसेना (उद्धव गुट) और कांग्रेस मुंबई में अलग-अलग चुनाव लड़ रही है. बीएमसी चुनाव में इस बार का मुकाबला काफी दिलचस्‍प हो गया है.

महाराष्ट्र में शहरी राजनीति की दिशा तय करने वाले नगर निगम चुनावों के लिए सियासी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच चुकी है. राज्य के 29 नगर निगमों में गुरुवार 15 जनवरी को मतदान प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक, ठाणे, नवी मुंबई और पिंपरी-चिंचवाड़ जैसे प्रमुख शहरी केंद्रों में सत्ता की तस्वीर साफ हो जाएगी. मंगलवार को चुनाव प्रचार थमने के बाद अब सभी दलों की नजरें मतदाताओं पर टिकी हैं. इन चुनावों में सबसे ज्यादा चर्चा मुंबई और पुणे की है. मुंबई में बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) पर कब्जे की लड़ाई को लेकर राजनीतिक दांव-पेंच चरम पर है. बीएमसी देश का सबसे अमीर नगर निकाय माना जाता है और 2017 में यहां आखिरी बार चुनाव हुए थे. इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है, क्योंकि मराठी अस्मिता के मुद्दे पर उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे लगभग दो दशक बाद साथ आए हैं. शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के इस मेल को मराठी वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. इसके सामने भाजपा के नेतृत्व वाला महायुति गठबंधन चुनौती पेश कर रहा है, जिसमें शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) भी शामिल है.
पुणे में भी सियासी समीकरण असामान्य हैं. साल 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विभाजन के बाद पहली बार दोनों धड़े (शरद पवार और अजित पवार) पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव में संयुक्त घोषणापत्र के साथ मैदान में उतरे हैं. इसका उद्देश्य वोटों के बंटवारे को रोकना और भाजपा को सीधी चुनौती देना बताया जा रहा है. वहीं, पुणे में भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच सीट बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाई, जिसके चलते शिवसेना ने यहां अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. इससे मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार हैं. राज्य के अन्य नगर निगमों में भी गठबंधन और एकला चलो की रणनीति देखने को मिल रही है. भाजपा और शिवसेना अधिकतर जगहों पर महायुति के तहत साथ हैं, जबकि एनसीपी ने कई निगमों में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है. लोकसभा और विधानसभा चुनाव 2024 के बाद बदले राजनीतिक माहौल का असर इन स्थानीय चुनावों में साफ दिखाई दे रहा है.

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By Ankshree

Ankit Srivastav (Editor in Chief )

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