पुणे में भी सियासी समीकरण असामान्य हैं. साल 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विभाजन के बाद पहली बार दोनों धड़े (शरद पवार और अजित पवार) पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव में संयुक्त घोषणापत्र के साथ मैदान में उतरे हैं. इसका उद्देश्य वोटों के बंटवारे को रोकना और भाजपा को सीधी चुनौती देना बताया जा रहा है. वहीं, पुणे में भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच सीट बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाई, जिसके चलते शिवसेना ने यहां अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. इससे मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार हैं. राज्य के अन्य नगर निगमों में भी गठबंधन और एकला चलो की रणनीति देखने को मिल रही है. भाजपा और शिवसेना अधिकतर जगहों पर महायुति के तहत साथ हैं, जबकि एनसीपी ने कई निगमों में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है. लोकसभा और विधानसभा चुनाव 2024 के बाद बदले राजनीतिक माहौल का असर इन स्थानीय चुनावों में साफ दिखाई दे रहा है.
महारस्ट्र: आज ‘शहर की सरकार’ के लिए वोटिंग हो रही है. मुख्य रूप से दो धड़ों (महायुति और एमवीए) के बीच चुनावी मुकाबला
पुणे में भी सियासी समीकरण असामान्य हैं. साल 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विभाजन के बाद पहली बार दोनों धड़े (शरद पवार और अजित पवार) पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम चुनाव में संयुक्त घोषणापत्र के साथ मैदान में उतरे हैं. इसका उद्देश्य वोटों के बंटवारे को रोकना और भाजपा को सीधी चुनौती देना बताया जा रहा है. वहीं, पुणे में भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच सीट बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाई, जिसके चलते शिवसेना ने यहां अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. इससे मुकाबला त्रिकोणीय होने के आसार हैं. राज्य के अन्य नगर निगमों में भी गठबंधन और एकला चलो की रणनीति देखने को मिल रही है. भाजपा और शिवसेना अधिकतर जगहों पर महायुति के तहत साथ हैं, जबकि एनसीपी ने कई निगमों में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है. लोकसभा और विधानसभा चुनाव 2024 के बाद बदले राजनीतिक माहौल का असर इन स्थानीय चुनावों में साफ दिखाई दे रहा है.

