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बीजेपी के ‘हिमंता इन बिहार’: क्या सम्राट चौधरी नीतीश कुमार की छाया में चमक पाएंगे?

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Apr 15, 2026 #alu, #Opinion
BJP’s 'Himanta in Bihar': Can Samrat Choudhary Shine in Shadow of Nitish Kumar?

सम्राट चौधरी की बिहार में मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद नई राजनीतिक बयार

पांच महीने बाद पुनः चुने जाने के ठीक बाद, 14 अप्रैल को नीतीश कुमार ने बिहार के राज्यपाल सैयद आइसा हुसैन को अपना इस्तीफा सौंपा। इसी दिन, भाजपा के सम्राट चौधरी ने राज भवन में नीतीश कुमार के साथ बैठकर विधायकों के नेता और एनडीए के बिहार इकाई प्रमुख के रूप में अपनी भूमिका ग्रहण की।

चुनाव परिणाम के दिन, 14 नवंबर 2025 को लिखी गई कहानी ने राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया। भाजपा ने बिहार में 89 विधायकों के साथ एक अभूतपूर्व जीत हासिल की है, जबकि विपक्ष पहले से काफी कमजोर हो चुका है। इस जीत ने नीतीश कुमार, जो वर्षों से रणनीतिक गठबंधनों की ताकत पर मुख्यमंत्री पद पर बने थे, की राजनीतिक पकड़ को चुनौती दी है।

इस नए राजनीतिक समीकरण में भाजपा ने जदयू को एक छोटे दल का दर्जा दे दिया है, जो पहले सत्ता में मुख्य साझेदार था। 2020 के चुनावों में, जदयू के 43 सीटें होने के बावजूद नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने रहे, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है।

यह कदम भारतीय राजनीति में भाजपा की बढ़ती दबदबे की पुष्टि करता है, जैसा कि संसद के विशेष सत्र में प्रजातांत्रिक महत्व के विधेयकों के पारित होने से भी स्पष्ट होता है।

बिहार में भाजपा के लिए सम्राट चौधरी का महत्व

दशकों तक बिहार में भाजपा को लेकर संदेह और सीमा थी। ब्राह्मण-गुड़िया पार्टी के रूप में पहचाने जाने वाली भाजपा ने नीतीश कुमार को समर्थन दिया ताकि लalu प्रसाद यादव के प्रभाव को तोड़ा जा सके। लalu यादव को समाज न्याय राजनीति का मसीहा माना जाता था, लेकिन समय के साथ राजनीतिक समीकरणों में बदलाव आए।

नीतीश कुमार ने कुर्मी-क्वैरी जाति गठबंधन के जरिए ओबीसी समाज में अपनी पकड़ मजबूत की और भाजपा ने ब्राह्मण-भूमिहार-बनिया वर्गों में अपनी लोकप्रियता बरकरार रखी। इसके बावजूद, कोएरी जाति के नेताओं में असंतोष बढ़ा था क्योंकि वे अपने राजनीतिक अधिकारों को कम आंकते थे।

इस जातीय खाई का लाभ भाजपा ने उठाया और सम्राट चौधरी को 2018 में पार्टी में लेकर जदयू से समर्थन तोड़कर अपनी ओर किया। 2023 में उन्हें बिहार भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया और बाद में 2024 के चुनावों के बाद उपमुख्यमंत्री पद पर पदस्थ किया गया।

हालांकि, भाजपा के नये मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी की छवि कुछ विवादास्पद है, क्योंकि उनका आरएसएस के साथ लंबा जुड़ाव नहीं है और उन्हें पूर्णतया संघ की परंपरा में पला बढ़ा नेता नहीं माना जाता। फिर भी यह एक नई दिशा प्रदान करता है, जहां भाजपा बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति में अपनी जड़ें मजबूत कर सकती है।

नीतीश कुमार का लंबा राजनीतिक साया

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का प्रभाव अभी भी प्रबल है। वे भले ही मुख्यमंत्री पद छोड़ चुके हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक पकड़ और सामाजिक गठजोड़ भाजपा के लिए चुनौती बने रहेंगे। कुर्मी-कोएरी गठबंधन को साधना और सत्ता-संतुलन बनाए रखना भाजपा के लिए खतरा हो सकता है।

नीतीश कुमार की सशक्त प्रशासनिक छवि ने उन्हें ‘सुशासन बाबू’ का खिताब दिलाया, जो सम्राट चौधरी के लिए आसान चुनौती नहीं होगी। उनका प्रतिबंध नीति, जिसने महिलाओं के समर्थन को मजबूत किया, भी भाजपा के लिए सीमा निर्धारित करती है।

बिहार का राजनीतिक परिदृश्य: क्या होगा अगला अध्याय?

सम्राट चौधरी ने गृह विभाग की जिम्मेदारी संभालते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीतियों से प्रेरणा लेने की कोशिश की है। उनके सख्त रवैये ने सुर्खियां बटोरीं, विशेष रूप से अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ अभियान में। लेकिन भाजपा और जदयू के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण रहेगा।

जदयू की 84 विधायकों के साथ नीतीश कुमार अभी भी राजनीतिक प्रक्रिया में सक्रिय हैं और पार्टी नेतृत्व को मार्गदर्शन देते रहते हैं। उन्होंने समर्थकों को आश्वस्त किया है कि वे राजनीतिक रूप से कभी भी पीछे नहीं हटेंगे।

नीतीश कुमार, जो पटना के 7, सर्कुलर रोड स्थित अपने आवास पर वापस लौटे हैं, जहाँ से उन्होंने कई बार राजनीतिक वापसी की है, अब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के लिए कड़ी निगरानी का काम कर सकते हैं।

(लेखक दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने भाजपा और जदयू की राजनीतिक गतिविधियों को वर्षों से कवर किया है। यह एक राय लेख है और उसमें व्यक्त विचार उनके अपने हैं।)

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Journalist & Entertainer Ankit Srivastav ( Ankshree)